बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जीएसटी बकाया वसूली के एक अहम मामले में याचिकाकर्ता मां काली इंडस्ट्रीज को बड़ी राहत देते हुए राज्य कर विभाग की कार्रवाई पर लगाम लगा दी है। जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक जीएसटी अपीलेट ट्रिब्यूनल का गठन नहीं हो जाता, तब तक करदाताओं को राहत दी जा सकती है। कोर्ट ने यह फैसला केंद्र सरकार के उस सर्कुलर के आधार पर सुनाया है जिसमें ट्रिब्यूनल की अनुपस्थिति में अपील करने वाले व्यापारियों के लिए विशेष दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। याचिकाकर्ता ने विभाग द्वारा जारी वसूली आदेशों और जनवरी 2026 में दिए गए अटैचमेंट नोटिस को अदालत में चुनौती दी थी।
वसूली पर रोक के लिए कोर्ट ने तय की शर्तें
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि इस मामले में अब किसी नए न्यायिक निर्णय की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सरकार ने पहले ही नियम स्पष्ट कर दिए हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वह संबंधित अधिकारी के समक्ष यह घोषणा पत्र प्रस्तुत करे कि ट्रिब्यूनल का गठन होते ही वह अपील दायर करेगा। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को जीएसटी कानून के तहत निर्धारित प्री-डिपॉजिट की राशि 15 दिनों के भीतर जमा करनी होगी। यदि व्यापारी तय समय में यह राशि जमा कर देता है और लिखित अंडरटेकिंग दे देता है, तो विभाग द्वारा की जा रही शेष बकाया राशि की वसूली पर तत्काल प्रभाव से रोक लग जाएगी।
समय-सीमा में विस्तार और केंद्र के सर्कुलर का लाभ
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने वित्त मंत्रालय के जुलाई 2024 वाले सर्कुलर और सितंबर 2025 की अधिसूचना का हवाला दिया जिसमें अपील दायर करने की समय-सीमा को 30 जून 2026 तक बढ़ाया गया है। इन विधिक प्रावधानों के आधार पर कोर्ट ने माना कि करदाताओं के हितों की रक्षा जरूरी है क्योंकि ट्रिब्यूनल न होने की सजा उन्हें नहीं दी जा सकती। इस फैसले से प्रदेश के उन तमाम कारोबारियों को बड़ी राहत मिली है जो ट्रिब्यूनल के अभाव में विभागीय वसूली की कार्रवाई का सामना कर रहे थे। अब प्री-डिपॉजिट और अंडरटेकिंग के जरिए व्यापारी अपनी संपत्ति को अटैच होने से बचा सकेंगे और कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए राहत पा सकेंगे।