रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार का वह सर्कुलर, जिसने सरकारी कर्मचारियों, कर्मचारी संगठनों, ट्रेड यूनियनों से लेकर RSS तक हलचल मचा दी थी, भारी विरोध के आगे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। सामान्य प्रशासन विभाग के इस आदेश को लेकर ऐसा बवाल मचा कि शासन को बैकफुट पर आना पड़ा। कर्मचारी संगठनों ने इसे “अधिकारों पर हमला” और “हिटलरशाही सोच” तक करार दिया, वहीं बढ़ते विवाद, राजनीतिक सवालों और संगठनात्मक दबाव के बीच सरकार को आदेश पर रोक लगानी पड़ी।
विवाद की जड़ वह परिपत्र बना, जिसमें सभी शासकीय सेवकों को किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से दूरी बनाने, किसी भी राजनीतिक गतिविधि में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदारी से बचने, बिना अनुमति किसी संस्था, समिति या संगठन में पद नहीं लेने और ऐसा कोई दायित्व स्वीकार नहीं करने को कहा गया था, जिससे निष्पक्षता प्रभावित हो। साथ ही नियम तोड़ने पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी ने कर्मचारियों में और बेचैनी बढ़ा दी।
हालांकि सरकार ने इसे पुराने नियमों का ‘रिमाइंडर’ बताया, लेकिन सवाल उठा कि अगर नियम पहले से लागू थे तो अचानक इतनी सख्त भाषा वाला नया सर्कुलर क्यों? और यहीं से बवाल भड़क गया। “संगठन” शब्द के व्यापक इस्तेमाल ने यह आशंका खड़ी कर दी कि क्या अब कर्मचारी फेडरेशन, यूनियन, सामाजिक-साहित्यिक संस्थाएं ही नहीं, बल्कि RSS जैसे संगठन भी इस दायरे में माने जाएंगे? यही सवाल राजनीतिक और वैचारिक टकराव का कारण बन गया।
प्रदेश कांग्रेस ने भी सरकार को घेरा और पूछा कि अगर परिपत्र के शब्दों को सच माना जाए, तो क्या RSS भी इस आदेश के दायरे में आएगा? यदि नहीं, तो सरकार साफ करे। सवाल उठा कि क्या यह आदेश चुनिंदा कार्रवाई का हथियार बन सकता है?
इधर छत्तीसगढ़ अधिकारी कर्मचारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा ने इस आदेश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने बताया कि सर्कुलर जारी होते ही सचिव सामान्य प्रशासन विभाग और उप सचिव अंशिका पांडेय को व्हाट्सएप के जरिए कड़ा विरोध दर्ज कराया गया था। साफ कहा गया था कि यह आदेश वापस नहीं हुआ तो हर स्तर पर आंदोलन होगा।
फेडरेशन के मुताबिक इस सर्कुलर ने कर्मचारी जगत में गहरी नाराजगी पैदा कर दी। कई कर्मचारी संगठनों, फेडरेशनों और अन्य समूहों ने इसे कर्मचारियों की स्वतंत्र भूमिका सीमित करने की कोशिश माना। उनका कहना है कि 1965 के सिविल सेवा आचरण नियम पहले से लागू थे, फिर इतने व्यापक और विवादास्पद सर्कुलर की जरूरत क्यों पड़ी? यही सबसे बड़ा सवाल है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आदेश की भाषा इतनी व्यापक थी कि रजिस्टर्ड सोसायटी, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन, साहित्यिक मंचों और कर्मचारी संगठनों में जुड़े पदाधिकारियों तक पर तलवार लटकती दिख रही थी। यही वजह रही कि कर्मचारियों के बीच इसे “हिटलरशाही फरमान” तक कहा जाने लगा।
सूत्र बताते हैं कि मामला तब और गरमा गया जब RSS से जुड़े लोगों ने भी इस पर आपत्ति जताते हुए कर्मचारी संगठनों से संपर्क किया। मीडिया और पोर्टल्स में खबरें चलने लगीं, विरोध बढ़ता गया और सरकार पर दबाव बनता गया। आखिरकार शासन को गंभीरता से समीक्षा करनी पड़ी और विवादित आदेश को फिलहाल होल्ड पर रख दिया गया।
सवाल अब भी कायम है क्या सरकार यह आदेश संशोधित कर फिर लाएगी? क्या यह केवल विरोध शांत करने की रणनीति है? या फिर बढ़ते दबाव के आगे सरकार ने कदम पीछे खींच लिए? फिलहाल इतना तय है कि एक सर्कुलर ने शासन, संगठन और विचारधारा तीनों को आमने-सामने ला खड़ा किया, और विरोध की आंधी में सरकार को झुकना पड़ा।