प्रयागराज/नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को भेज दिया है। जस्टिस वर्मा यह कदम उस समय उठाया है, जब उनके खिलाफ संसद में महाभियोग (पद से हटाने की प्रक्रिया) की कार्रवाई चल रही थी।
क्या है पूरा मामला? इस पूरे विवाद की जड़ पिछले साल मार्च में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर हुई एक घटना है। जस्टिस वर्मा के घर पर अचानक आग लग गई थी। आरोप है कि आग बुझाने के दौरान वहां से भारी मात्रा में अधजली नकदी (कैश) बरामद हुई। इस ‘कैश कांड’ के सामने आने के बाद हड़कंप मच गया और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत जांच शुरू की गई।
संसद में शुरू हुई थी कार्रवाई मामले की गंभीरता को देखते हुए अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस प्रस्ताव पर 146 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। नियमों के मुताबिक, आरोपों की गहराई से जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक विशेष समिति बनाई गई थी, जो अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है।
जस्टिस वर्मा का पक्ष जांच समिति के सामने जस्टिस वर्मा ने खुद को बेकसूर बताया था। उन्होंने दलील दी थी कि जिस दिन उनके घर पर आग लगी और कैश मिलने का दावा किया गया, उस दिन वह दिल्ली में मौजूद ही नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर अधिकारी उनके घर की सुरक्षा करने में नाकाम रहे, तो इसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
क्या होगा असर? महाभियोग की प्रक्रिया के बीच जज का इस्तीफा देना काफी अहम माना जा रहा है। आमतौर पर महाभियोग की कार्यवाही तब की जाती है जब जज पद पर बने रहें। अब उनके इस्तीफे के बाद यह देखना होगा कि जांच समिति और संसद इस मामले को आगे किस तरह लेकर जाती है। इस घटना ने न्यायिक जगत में एक बड़ी बहस छेड़ दी है।