-सुभाष मिश्र
पश्चिम एशिया में पिछले 40 दिनों से जारी तनाव के बाद ईरान, अमेरिका और इजऱायल के बीच 15 दिनों के युद्ध विराम (सीजफ़ायर) की सहमति पहली नजऱ में राहत की खबर जरूर लगती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह शांति स्थायी होगी, या केवल एक रणनीतिक विराम है ताकि पक्ष अपनी-अपनी स्थिति मजबूत कर सकें?
इतिहास गवाह है कि इस क्षेत्र में युद्ध विराम अक्सर स्थायी समाधान नहीं, बल्कि अगली टकराव की भूमिका तैयार करते रहे हैं। खासकर डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी विदेश नीति का रिकॉर्ड यह संकेत देता है कि कूटनीतिक बयान और जमीनी कार्रवाई में अंतर रहा है। ऐसे में यह संदेह स्वाभाविक है कि दो हफ्तों का यह विराम भरोसे की नींव पर नहीं, बल्कि दबाव और रणनीतिक गणनाओं पर टिका है।
ईरान की ओर से चीन और रूस को सच्चा दोस्त बताना और उन्हें शांति गारंटी का संभावित भागीदार मानना, इस संघर्ष को क्षेत्रीय से वैश्विक शक्ति संतुलन के दायरे में ले आता है। यदि ये शक्तियां सक्रिय भूमिका निभाती हैं, तो यह संघर्ष केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एक नए ब्लॉक पॉलिटिक्स का संकेत देगा, जहां एक ओर अमेरिका-इजऱायल धुरी होगी, तो दूसरी ओर ईरान-चीन-रूस का समीकरण उभर सकता है।
इस पूरे परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन यथार्थ यह है कि वैश्विक मंच अक्सर महाशक्तियों के हितों के बीच संतुलन बनाने में सीमित साबित हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों की मध्यस्थता की कोशिशें एक क्षेत्रीय समाधान की संभावना जरूर पैदा करती हैं, पर उनकी प्रभावशीलता पर अभी प्रश्नचिह्न बना हुआ है।
भारत के लिए यह स्थिति केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न भी है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाला वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा सीधे भारत की ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा है। भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85फीसदी जरूरत आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 60फीसदी के करीब है। ऐसे में इस समुद्री मार्ग में किसी भी तरह की बाधा न केवल आपूर्ति संकट पैदा कर सकती है, बल्कि महंगाई और आर्थिक अस्थिरता को भी बढ़ा सकती है।
हालिया घटनाओं में 3000 से अधिक जहाजों का इस जलडमरूमध्य के आसपास ठहरना, और भारत के कई जहाजों का फंसा होना, इस संकट की गंभीरता को उजागर करता है। कच्चे तेल की कीमतों का 119 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचना इस बात का संकेत है कि बाजार भी इस अनिश्चितता को लेकर आशंकित है।
दूसरी ओर, बेंजामिन नेतन्याहू का यह कहना कि यह युद्ध विराम हिज़्बुल्लाह के खिलाफ लागू नहीं होगा, इस पूरे समझौते की सीमाओं को स्पष्ट करता है। यानी एक मोर्चे पर शांति की बात हो रही है, जबकि दूसरे मोर्चे पर संघर्ष जारी रह सकता है, जो इस क्षेत्र की जटिलता को और बढ़ाता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू है, सूचना और नैरेटिव की लड़ाई। जहां एक ओर यह दावा किया जा रहा है कि अमेरिका इस संघर्ष में कमजोर पड़ा है, वहीं दूसरी ओर वह अपने कदमों को रणनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहा है। यह परसेप्शन मैनेजमेंट भी आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुका है।
यह युद्ध विराम उम्मीद और आशंका—दोनों का मिश्रण है। यदि इसे ईमानदारी से लागू किया जाता है और कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाया जाता है, तो यह एक बड़े संघर्ष को टाल सकता है। लेकिन यदि यह केवल समय हासिल करने की रणनीति है, तो आने वाले दिनों में स्थिति और विस्फोटक हो सकती है।
दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह 15 दिन शांति की नींव बनेंगे या फिर अगले बड़े टकराव की प्रस्तावना। भारत सहित वैश्विक समुदाय की प्राथमिकता स्पष्ट है, होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुला रहे, ऊर्जा आपूर्ति सुचारु रहे और युद्ध की आग कूटनीति से बुझाई जाए, न कि बारूद से।
युद्ध विराम या रणनीतिक विराम?

09
Apr