नक्सलवाद पर आखिरी चोट, समर्पण का अवसर या समाप्ति का खतरा

-सुभाष मिश्र

बस्तर के जंगलों में दशकों से गूंजती रही बंदूक की आवाज अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ती दिख रही है। केंद्र सरकार द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के समूल उन्मूलन की तय समयसीमा अब बेहद करीब है, और इसी के साथ घटनाक्रम ने निर्णायक मोड़ ले लिया है।
बस्तर आईजी सुंदरराज पी द्वारा सक्रिय माओवादियों को दिया गया 48 से 72 घंटे का अल्टीमेटम केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष की अंतिम घोषणा है जिसमें अब समर्पण या समाप्ति के अलावा कोई तीसरा विकल्प शेष नहीं दिखता। यह स्थिति अचानक नहीं बनी है। पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, रणनीतिक घेराबंदी और तकनीक के इस्तेमाल ने नक्सल संगठन की जड़ों को कमजोर कर दिया है। हजारों की संख्या में आत्मसमर्पण, सैकड़ों गिरफ्तारियां और मुठभेड़ों में शीर्ष कमांडरों का अंत—ये सब मिलकर उस ढांचे को ध्वस्त कर चुके हैं जिस पर कभी नक्सल आंदोलन खड़ा था। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी जैसी संरचनाएं, जो कभी रणनीति का केंद्र थीं, अब लगभग निष्क्रिय हो चुकी हैं। पापाराव जैसे बड़े कमांडर का अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण इस पतन का प्रतीकात्मक और वास्तविक दोनों संकेत है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा घोषित 31 मार्च डेडलाइन अब केवल राजनीतिक बयान नहीं रह गई, बल्कि जमीनी हकीकत में बदलती नजर आ रही है। राज्य के स्तर पर भी यह स्पष्ट है कि सरकार अब किसी ढिलाई के मूड में नहीं है। चेतावनी साफ है—जो अब भी हथियार नहीं छोड़ेंगे, उन्हें सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई का सामना करना होगा।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि सरकार ने केवल बंदूक से जवाब नहीं दिया, बल्कि पुनर्वास का रास्ता भी खुला रखा है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था ने संगठन के भीतर ही मोहभंग पैदा किया है। यही कारण है कि अब बंदूक छोडऩे वालों की संख्या बढ़ी है। यह संकेत है कि नक्सलवाद केवल सुरक्षा दबाव से नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक स्तर पर भी कमजोर पड़ा है।
फिर भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि विचारधारा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इतिहास गवाह है कि कोई भी विचार अचानक खत्म नहीं होता लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब विचारधारा के नाम पर हिंसा, लेवी वसूली, निर्दोषों की हत्या और भय का साम्राज्य खड़ा हो जाए तो उसका नैतिक आधार खुद ही कमजोर पड़ जाता है। बस्तर में यही हुआ। जिन मुद्दों को लेकर यह आंदोलन खड़ा हुआ था, वे धीरे-धीरे अपराध और अराजकता में बदलते चले गए।
आज जो गिने-चुने नक्सली जंगलों में बचे हैं, वे किसी संगठित आंदोलन का हिस्सा कम और एक बिखरे हुए ढांचे के अवशेष ज्यादा नजर आते हैं। उनके सामने अब स्पष्ट विकल्प है—या तो वे समय रहते आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट आएं, या फिर एक ऐसी लड़ाई में खुद को झोंक दें जिसका अंत तय है। सरकार की क्लियर, होल्ड और डेवलप रणनीति भी अब जमीन पर दिखने लगी है। जहां कभी सुरक्षा कैंप ही एकमात्र उपस्थिति थे, वहां अब विकास योजनाएं, संवाद और प्रशासनिक पहुंच बढ़ रही है। यह बदलाव केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि विश्वास बहाली का भी है। अगर यह प्रक्रिया निरंतर और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ती है, तो बस्तर का भविष्य वास्तव में बदल सकता है।
यह समय केवल जीत की घोषणा करने का नहीं, बल्कि सावधानी और संतुलन का भी है। क्योंकि नक्सलवाद का अंत केवल बंदूक से नहीं, बल्कि न्याय, विकास और विश्वास से ही स्थायी रूप से सुनिश्चित होगा।
बस्तर आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। नक्सल गढ़ से नक्सल मुक्त क्षेत्र बनने की यह यात्रा अपने अंतिम अध्याय में है। अब यह अध्याय कैसे समाप्त होगा, यह केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नहीं, बल्कि उन आखिरी बचे नक्सलियों के फैसले से भी तय होगा।
यह सचमुच आखिरी अवसर है—
समर्पण कर नई शुरुआत करने का,
या फिर इतिहास के एक समाप्त अध्याय का हिस्सा बन जाने का।

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