बढ़ रही उम्र, घट रहा उत्पादन, संकट में वनों का कल्पवृक्ष महुआ

राजकुमार मल

भाटापारा- 50 से 100 वर्ष की उम्र पार कर रहे हैं महुआ के वृक्ष। उम्र दराज हो चले इन वृक्षों ने कमजोर उत्पादन के रूप में यह संदेश दे दिया है प्रदेश को। संदेश यह भी भेजा है कि अब ज्यादा दिनों तक साथ नहीं दे पाएंगे।

चिंता में हैं वानिकी वैज्ञानिक महुआ के वृक्षों की दशा को देखकर। ताजा स्थितियां इसलिए गंभीर मानी जा रहीं हैं क्योंकि प्राकृतिक वन संरचना में चिंताजनक बदलाव आ रहा है। यह नया परिवर्तन अर्ध प्राकृतिक मिश्रित वनों में मौजूद महुआ के वृक्षों में सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। इसलिए फौरन सुधारात्मक उपाय की जरूरत समझी जा रही है।


संकट में वनों का कल्पवृक्ष

असमय वर्षा, तापमान में आश्चर्यजनक वृद्धि, सर्दियों के दिनों का कम होना और असंतुलित बारिश जैसे जलवायु परिवर्तन अब महुआ के वृक्षों की उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं, तो फफूंदजनित रोग, जड़ों का सड़न और पत्तियों में धब्बा रोग की शिकायतें भी अब वानिकी वैज्ञानिकों तक पहुंचने लगीं हैं। चिंताजनक इसलिए भी क्योंकि यह स्थितियां साल-दर- साल फैलाव ले रहीं हैं।


बढ़ रही उम्र, घट रहा उत्पादन

छत्तीसगढ़ के अर्धमिश्रित वनों में मौजूद महुआ के अधिकांश वृक्षों की उम्र 50 से 100 वर्ष के करीब पहुंच चुकी है। ऐसे में प्रति वृक्ष उत्पादन क्षमता महज 60 से 70 किलोग्राम रह गई है। जबकि मानक उत्पादक क्षमता 80 से 100 किलोग्राम मानी गई है। इसकी वजह से प्रदेश में महुआ की सालाना उत्पादन पर गहरा असर देखा जा रहा है। बीते सत्र में प्रदेश में 40000 टन महुआ फूलों का संग्रहण हुआ था। इस वर्ष इसमें 25 फ़ीसदी गिरावट की आशंका है।


कमजोर उत्पादन इसलिए भी

प्राकृतिक पुनर्जनन और रोपण को लेकर भी उत्साह नहीं। मानव आबादी का विस्तार, पशु चराई और जंगलों में आग भी ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो वृक्षों की संख्या कम कर रहें हैं। वनों की कटाई, खनन गतिविधियां और कृषि क्षेत्र का विस्तार भी घटते वृक्षों और घटते उत्पादन की वजह बन रहा है। मिट्टी की कमजोर उर्वर क्षमता और घटती नमी अब स्थाई समस्या बन चुकी है। यह स्थिति जैव विविधता को कमजोर कर रही है।


मांग रहा वैज्ञानिक प्रबंधन

महुआ को अभी भी जंगली वृक्ष के रूप में देखा जाता है जबकि यह महत्वपूर्ण आर्थिक वृक्ष है लेकिन बदलते आर्थिक परिदृश्य में महुआ अब उन्नत प्रजातियों की जरूरत बता रहा है। पोषण प्रबंधन को लेकर बढ़ती जा रही लापरवाही की जगह गंभीरता के साथ वैज्ञानिक तरीकों से छंटाई को आवश्यक मान रहा है क्योंकि ताजा स्थितियां अगले बरस कमजोर पुष्पन की ओर इशारा कर रहीं हैं।

महुआ के लिए जरूरी वैज्ञानिक प्रबंधन

महुआ के वृक्षों की बढ़ती उम्र और बदलती जलवायु परिस्थितियां उत्पादन में गिरावट का मुख्य कारण बन रही हैं। अब आवश्यकता है कि महुआ को केवल जंगली वृक्ष न मानकर एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रजाति के रूप में देखा जाए। इसके लिए नए पौधरोपण, वैज्ञानिक प्रबंधन, संरक्षण और उन्नत किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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