भारतीय क्रिकेट इस समय एक ऐसी अनोखी समस्या से जूझ रहा है, जिसके लिए दुनिया की ज्यादातर टीमें तरसती हैं। यहाँ चिंता यह नहीं है कि ओपनर कौन होगा, बल्कि यह है कि जिसने शानदार रन बनाए हैं, उसे टीम से बाहर कैसे किया जाए। इस पूरी बहस के केंद्र में है एक पंद्रह साल का लड़का, जिसका नाम वैभव सूर्यवंशी है। जितनी तेजी से वैभव ने क्रिकेट की दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, उतनी ही तेजी से एक बड़ी बहस भी खड़ी हो गई है। सवाल यह है कि क्या संजू सैमसन, अभिषेक शर्मा या ईशान किशन जैसे बल्लेबाजों में से किसी को सिर्फ इसलिए बाहर कर देना चाहिए कि एक असाधारण नई प्रतिभा दरवाजा खटखटा रही है।
चयन का नियम पूरी तरह न्यायसंगत नहीं हो सकता
बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक का कहना है कि जो बल्लेबाज लगातार रन बना रहा हो, उसे सिर्फ किसी नए खिलाड़ी को मौका देने के लिए बाहर करना सही नहीं होगा। यह बात सुनने में बिल्कुल ठीक लगती है क्योंकि मेहनत का इनाम मिलना ही चाहिए। लेकिन भारतीय टीम का चयन कोई पुरस्कार वितरण समारोह नहीं है। यहाँ मेडल नहीं बांटे जाते, बल्कि अगला मैच जिताने वाली सबसे मजबूत टीम चुनी जाती है। यही वजह है कि चयन का पहला नियम है कि यह कभी पूरी तरह न्यायसंगत नहीं हो सकता। हर चयन के साथ किसी न किसी योग्य खिलाड़ी के साथ थोड़ा बहुत अन्याय होता ही है। अगर चयन का पैमाना केवल पहले का प्रदर्शन होता, तो शायद सचिन तेंदुलकर को भी सोलह साल की उम्र में मौका न मिलता।
जब रन नहीं, सामने भविष्य खड़ा हो
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जगह बचाने का सबसे बड़ा तरीका लगातार रन बनाना है। लेकिन कभी-कभी सामने वाला खिलाड़ी सिर्फ रन नहीं, बल्कि टीम का भविष्य लेकर आता है। वैभव सूर्यवंशी की चर्चा इसलिए अलग है क्योंकि वह सिर्फ रन नहीं बना रहे, वह लोगों की सोच बदल रहे हैं। पैट कमिंस और मिचेल स्टार्क जैसे दिग्गज गेंदबाज भी उन्हें हल्के में नहीं लेते। हालांकि, इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत है। अगर कोई बल्लेबाज लगातार टीम के लिए निडर होकर खेल रहा है और फिर भी उसकी जगह सुरक्षित नहीं रहती, तो टीम के बाकी खिलाड़ियों में एक गलत संदेश जाता है। खिलाड़ी टीम के लिए कम और अपनी जगह बचाने के लिए ज्यादा खेलने लगते हैं।
भरोसा बनाए रखना कप्तान और कोच की असली परीक्षा
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में टी२० क्रिकेट में जिस बेखौफ बल्लेबाजी के अंदाज को अपनाया है, उसकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि खिलाड़ी फेल होने के डर से मुक्त होकर खेलते हैं। उस भरोसे को टूटने नहीं देना भी टीम मैनेजमेंट की बड़ी जिम्मेदारी है। यहीं कप्तान और कोच की असली परीक्षा होती है। उन्हें सिर्फ सही टीम नहीं चुननी होती, बल्कि बाहर बैठे खिलाड़ियों का हौसला भी बनाए रखना होता है। फिर भी एक सवाल बचता है कि अगर भारतीय टीम सचमुच मानती है कि वैभव सूर्यवंशी दो हजार सत्ताईस के वनडे विश्व कप की योजना का हिस्सा बन सकते हैं, तो उसकी तैयारी अभी से शुरू करनी होगी। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैदान पर उतरकर और गलतियों से ही सीखा जाता है।