नई कालोनियाँ, नई बसावट, नए विवाद पर नियम नदारद

-सुभाष मिश्र

मनुष्य का इतिहास केवल सभ्यता के विकास का इतिहास नहीं है, बल्कि उसकी बसाहट के बदलते स्वरूप का भी इतिहास है। कभी मनुष्य कबीले में रहता था, फिर गांव बने, कस्बे बने, शहर बने और आज गेटेड कॉलोनियां, टाउनशिप और मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट आधुनिक शहरी जीवन की पहचान बन गए हैं। हर दौर में बसाहट बदली तो उसके साथ सामाजिक रिश्ते, जिम्मेदारियां और विवाद भी बदले। आज भारत का तेजी से बढ़ता शहरीकरण हमें एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर चुका है, जहां नई बसाहटों के लिए नए कानूनों की आवश्यकता महसूस होने लगी है।
मशहूर गायक के. एल. सहगल का गाया हुआ गीत –
‘एक बंगला बने न्यारा, रहे कुनबा जिसमें सारा
भारतीय समाज के उस सपने का प्रतीक था, जिसमें अपना घर और अपना परिवार सबसे बड़ा सुख माना जाता था। समय बदल गया है। बंगले और फ्लैट तो बन रहे हैं, लेकिन ‘कुनबा का अर्थ बदल गया है। अब संयुक्त परिवार की जगह एक ही परिसर, एक ही टाउनशिप या एक ही मल्टीस्टोरी में रहने वाले सैकड़ों परिवार नया कुनबा बन गए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस कुनबे के लोगों की भाषा अलग है, खान-पान अलग है, संस्कृति अलग है, जीवनशैली अलग है और सोच भी अलग-अलग है। ऐसे में टकराव की संभावनाएं भी स्वाभाविक रूप से बढ़ी हैं।
कभी अपना घर बनाने का सपना केवल चार दीवारों तक सीमित था। अब घर का अर्थ केवल एक फ्लैट या प्लॉट नहीं, बल्कि साझा जीवन का हिस्सा भी है। लिफ्ट, पार्क, क्लब हाउस, सड़क, स्ट्रीट लाइट, पानी की टंकी, सीवरेज, सुरक्षा गार्ड, सीसीटीवी और सामुदायिक भवन , ये सब आधुनिक कॉलोनी की पहचान और लगभग जरूरत हैं। लेकिन इन्हीं साझा सुविधाओं के साथ साझा विवाद भी पैदा हो रहे हैं।
आज लगभग हर बड़े शहर में एक जैसी तस्वीर दिखाई देती है। कॉलोनाइजर आकर्षक विज्ञापनों के साथ सपनों का शहर बेचता है। चौड़ी सड़कें, हरियाली, चौबीस घंटे पानी, आधुनिक सुरक्षा और बेहतर जीवन का सपना दिखाया जाता है, लेकिन कुछ वर्षों बाद वही कॉलोनी अधूरी सड़क, खराब लिफ्ट, सूखा पार्क, टूटी स्ट्रीट लाइट, पानी की समस्या और मेंटेनेंस के झगड़ों की पहचान बन जाती है। बिल्डर कहता है कि उसने काम पूरा कर दिया, रहवासी कहते हैं कि सुविधाएं अधूरी हैं। स्थानीय निकाय जिम्मेदारी लेने से बचते हैं और अंतत: सबसे ज्यादा परेशान वही नागरिक होता है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगाकर वहां घर खरीदा है।
लेकिन यह संकट केवल अधूरी सुविधाओं के साथ बनी कालोनियों तक सीमित नहीं है। चुनौती इससे आगे भी है। शहरों में अब सामूहिक जीवन की संस्कृति कठिन है। भारत में हम व्यक्तिगत रूप से शिक्षित जरूर हुए हैं, लेकिन समाज, सोसाइटी या मल्टी स्टोरी में जीवन का अनुशासन या सलीका अभी भी पूरी तरह आया नहीं है। और ना कोई सीखने को तैयार है। आज पड़ोस की तकलीफ की परवाह किए बगैर किसी को तेज आवाज में संगीत बजाने में आनंद आता है, कोई धार्मिक आयोजन के नाम पर अनाप-शनाप भीड़ और डीजे के शोर से पूरी कॉलोनी की शांति को भंग करता है। कोई पार्क को निजी संपत्ति समझने लगता है। फूल-पत्ती तोड़ता है। पालतू कुत्तों को घुमाने लाकर गंदगी फैलाता है। पार्क के भीतर साइकिल चलाता है। कोई पालतू कुत्तों को लेकर विवाद खड़ा कर देता है, कोई मेंटेनेंस शुल्क देने से बचता है, तो कोई सामुदायिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में भी संकोच नहीं करता। प्राय: कॉलोनी में कोई बगैर किसी नियम कायदे के या स्वीकृति के मकान की ऊपरी मंजिल बना लेगा या आंगन ढक लेगा। यदि थोड़ा भी राजनीतिक वर्चस्व हुआ तो सड़क तक अतिक्रमण कर लेगा। हाल ही में देश में नवधनाड्य उभरा है, जिनके पास एकाएक संपन्नता आई है, लेकिन उनकी मानसिकता अभी भी मध्य वर्ग से नीचे है। वे केवल नितांत निजी स्तर पर सोचते हैं। सिर्फ अपना लाभ। दूसरों का नुकसान होकर भी उन्हें लाभ या सुविधा मिलती है तो वे नि:संकोच नियम तोड़कर काम करते हैं। चाहे मकान को आगे बढ़ाकर शासकीय जमीन पर अतिक्रमण कर लेना। चोरी छुपे एक अतिरिक्त नल जोड़ लेना। पड़ोस में कचरा फेंक देना। ड्रेनेज पाइप पड़ोस के आंगन में छोड़ देना, क्योंकि उनमें सामाजिकता और सामुदायिकता की भावना लगभग खत्म हो चुकी है। व्यक्ति हद से ज्यादा स्वार्थी और आत्म केंद्रित हो गया है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना शहरी जीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
इतना ही नहीं, अब कॉलोनियों के भीतर एक नया सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य भी उभर रहा है। पहले विवाद पानी, बिजली, पार्किंग और मेंटेनेंस तक सीमित रहते थे, लेकिन अब कॉलोनियों के व्हाट्सऐप ग्रुप, रहवासी समितियों और सोसायटी के चुनावों में वैचारिक मतभेद, राजनीतिक ध्रुवीकरण, धार्मिक पहचान और सामाजिक विभाजन भी दिखाई देने लगे हैं। राष्ट्रीय राजनीति की गर्मी अब कॉलोनियों की बैठकों तक पहुंच चुकी है। कहीं धार्मिक आयोजनों को लेकर मतभेद हैं, कहीं त्योहारों के आयोजन पर विवाद है, कहीं खान-पान को लेकर बहस है, तो कहीं सोसायटी के चुनाव किसी विधानसभा चुनाव जैसी कटुता के साथ लड़े जा रहे हैं। जिस घर में लोग सुकून की तलाश में आते हैं, वहीं वैचारिक खेमेबंदी और सामाजिक तनाव भी उनके साथ रहने लगे हैं। यह शहरी भारत की नई वास्तविकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
संभवत: एक यह कारण भी है जिसके कारण लोग अब बड़े शहरों की अपेक्षा पहाड़ों या गांव में मकान लेकर रहना पसंद कर रहे हैं। दरअसल, भारत के अधिकांश कानून उस समय बने थे, जब शहरी आबादी इतनी विशाल नहीं थी और गेटेड कम्युनिटी जैसी अवधारणा भी सीमित थी। आज हजारों परिवार एक ही परिसर में रहते हैं। जवाबदेही तय होती है और विवाद भी पैदा होते हैं, लेकिन इन विवादों के समाधान के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं है।
यही कारण है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आवासीय कल्याण संघों, सोसायटियों और कॉलोनियों के लिए समग्र कानून बनाने की पहल स्वागत योग्य है। प्रदेश में रेरा में पंजीकृत 2,113 कॉलोनियां हैं और लगभग हर कॉलोनी में हैंडओवर, मेंटेनेंस, वित्तीय पारदर्शिता और सामुदायिक सुविधाओं को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। नगर एवं ग्राम निवेश विभाग द्वारा प्रस्तावित कानून यदि सही स्वरूप में बनता है तो यह केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है, लेकिन कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा। कानून को कुछ मूलभूत प्रश्नों का उत्तर भी देना होगा। बिल्डर कब तक जिम्मेदार रहेगा? हैंडओवर की स्पष्ट प्रक्रिया क्या होगी? मेंटेनेंस शुल्क का निर्धारण कैसे होगा? सोसायटी के खातों का स्वतंत्र ऑडिट कैसे सुनिश्चित होगा? विवादों का त्वरित निपटारा किस मंच पर होगा? और सबसे महत्वपूर्ण, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, हाउसिंग बोर्ड और रहवासी समितियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से कैसे तय होंगी?
आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कॉलोनी बनने तक बिल्डर जिम्मेदार होता है, उसके बाद वह हाथ खड़े कर देता है। हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी बनाकर नगर निगम को सौंप देता है। नगर निगम कहता है कि अभी औपचारिक हस्तांतरण नहीं हुआ। इस बीच पार्क पर कब्जे हो जाते हैं, सामुदायिक भवन जर्जर हो जाते हैं, स्ट्रीट लाइटें बंद हो जाती हैं और रहवासी अदालतों तथा सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाते रहते हैं। कई सरकारी आवासीय परिसरों की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। कहीं वर्षों तक मकान खाली पड़े रहते हैं, कहीं निर्माण के कुछ समय बाद ही वे खंडहर जैसे दिखाई देने लगते हैं, तो कहीं सामुदायिक सुविधाओं का कोई संरक्षक ही नहीं बचता। यह प्रशासनिक लाचारी या काहिली खत्म होना चाहिए।
देश में समय-समय पर समाज की नई जरूरतों के अनुसार नए कानून बने हैं। अब तेजी से बढ़ते शहरी समाज के लिए भी आधुनिक आवासीय जीवन से जुड़े व्यापक कानूनों की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देने लगी है। यह केवल संपत्ति का नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की गुणवत्ता का प्रश्न है। जो कुछ हद तक कानून व्यवस्था से भी जुड़ा है।
शहर केवल इमारतों से नहीं बनते, बल्कि नागरिक संस्कृति से बनते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने शहरीकरण के साथ पैदा हुई एक नई सामाजिक समस्या को समय रहते पहचान लिया है। अब आवश्यकता केवल इतनी है कि बनने वाला कानून कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि बिल्डर, रहवासी, स्थानीय निकाय और प्रशासन, सभी की जवाबदेही तय करे, क्योंकि आने वाले भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल नए शहर बसाना नहीं होगी, बल्कि उन शहरों में रहने वाले इस नए ‘कुनबे को साथ लेकर चलना भी होगी। तभी ‘एक बंगला बने न्यारा, रहे कुनबा जिसमें सारा का सपना सच मायनों में पूरा हो सकेगा।

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