इबोला वायरस : मॉडर्ना और ऑक्सफोर्ड समेत 3 वैक्सीन पर रिसर्च तेज; भारत संभालेगा प्रोडक्शन

नई दिल्ली। पूर्वी अफ्रीका में जानलेवा इबोला वायरस का प्रकोप एक बार फिर तेजी से पैर पसार रहा है। अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा घोषित किए गए इस सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है cite: अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने 15 मई को इस प्रकोप की घोषणा की थी। इसके दो दिन बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल माना।। कांगो और युगांडा जैसे देशों में संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और अब तक दर्जनों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

इस बार कहर बरपा रहा इबोला का ‘बुंडीबुग्यो’ (Bundibugyo) स्ट्रेन बेहद दुर्लभ है, जिसके इलाज या बचाव के लिए फिलहाल दुनिया में कोई भी मंजूरशुदा वैक्सीन मौजूद नहीं है [cite: संक्रमण फैलाने वाला बुंडीबुग्यो (Bundibugyo) स्ट्रेन दुर्लभ है और इसके लिए अभी तक कोई मंजूरशुदा वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।]। ऐसे में वैश्विक महामारी तैयारियों के लिए बने संगठन ‘CEPI’ ने तीन बड़े वैक्सीन प्रोजेक्ट्स को फंडिंग देकर इस पर रिसर्च तेज कर दी है [cite: मौजूदा इबोला प्रकोप को देखते हुए दुनिया की कई बड़ी स्वास्थ्य और रिसर्च संस्थाएं बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ वैक्सीन विकसित करने में जुटी हैं। इस काम के लिए कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनोवेशंस (CEPI) ने तीन अलग-अलग वैक्सीन प्रोजेक्ट्स को फंडिंग देने की घोषणा की है।]।

इन 3 बड़ी वैक्सीनों पर टिकी हैं उम्मीदें
मॉडर्ना की mRNA वैक्सीन: कोरोना काल में अपनी खास तकनीक के लिए मशहूर हुई कंपनी मॉडर्ना को इस रिसर्च के लिए करीब 50 मिलियन डॉलर की बड़ी फंडिंग मिली है [cite: मॉडर्ना की mRNA वैक्सीन: कोविड-19 महामारी के दौरान अपनी mRNA वैक्सीन के लिए चर्चा में रही कंपनी Moderna को इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 50 मिलियन डॉलर की फंडिंग दी गई है।]। कंपनी उसी सफल mRNA तकनीक के जरिए इबोला के इस नए स्ट्रेन को मात देने की तैयारी कर रही है, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को वायरस से लड़ना सिखाती है [cite: कंपनी उसी mRNA तकनीक का इस्तेमाल कर रही है, जिसने कोरोना वैक्सीन को तेजी से विकसित करने में मदद की थी। इस तकनीक में शरीर को वायरस से लड़ने के लिए जरूरी आनुवंशिक निर्देश दिए जाते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम संक्रमण के खिलाफ तैयार हो जाता है।]।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को इस प्रोजेक्ट के लिए 8.6 मिलियन डॉलर की सहायता दी गई है [cite: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (University of Oxford) को 8.6 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली है।]। ब्रिटिश वैज्ञानिक उसी वैक्सीन प्लेटफॉर्म (AstraZeneca COVID-19 वैक्सीन वाला बेस) पर काम कर रहे हैं, जो शरीर में वायरस के खिलाफ मजबूत एंटीबॉडी तैयार करने में कारगर रहा है [cite: यह टीम उसी प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रही है जिसका इस्तेमाल कोविड-19 के दौरान विकसित Oxford–AstraZeneca COVID-19 vaccine में किया गया था। इसमें एक संशोधित और सुरक्षित वायरस के जरिए शरीर में इम्यून प्रतिक्रिया पैदा की जाती है, ताकि भविष्य में असली वायरस से मुकाबला किया जा सके।]।

IAVI की वैक्सीन: इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव (IAVI) को भी 3.2 मिलियन डॉलर की मदद मिली है। यह संस्था एक हानिरहित और कमजोर वायरस का इस्तेमाल कर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को इबोला पहचानने के लिए प्रशिक्षित कर रही है [cite: यह संस्था ऐसी तकनीक पर काम कर रही है जिसमें एक कमजोर और हानिरहित वायरस का उपयोग करके शरीर को इबोला वायरस को पहचानने और उसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।]।

भारत का ‘सीरम इंस्टीट्यूट’ संभालेगा जिम्मेदारी
इस वैश्विक मुहिम में भारत एक बार फिर ‘दुनिया की फार्मेसी’ बनकर उभरेगा। यदि ये तीनों वैक्सीन ट्रायल के चरणों में सफल रहती हैं, तो इनके बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) की जिम्मेदारी भारत के ‘सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ (SII) को सौंपी गई है। दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता होने के नाते सीरम इंस्टीट्यूट का अनुभव इस महामारी को रोकने में गेम-चेंजर साबित हो सकता है [cite: सीरम इंस्टीट्यूट दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता माना जाता है और पहले भी कोविड-19 सहित कई वैश्विक टीकाकरण अभियानों में अहम भूमिका निभा चुका है।]।

क्यों मुश्किल हो रही है इस संक्रमण की राह?
बुंडीबुग्यो स्ट्रेन का इतिहास देखें तो यह पहली बार 2007 में युगांडा और फिर 2012 में कांगो में देखा गया था [cite: इस स्ट्रेन के लिए वैक्सीन क्यों नहीं है? मौजूदा प्रकोप के लिए जिम्मेदार बुंडीबुग्यो स्ट्रेन पहली बार 2007 में युगांडा में सामने आया था और फिर 2012 में कांगो में देखा गया।]। बहुत कम बार सामने आने के कारण इस पर पहले ज्यादा रिसर्च नहीं हो सकी। इसके अलावा वर्तमान में कांगो के प्रभावित इलाकों में चल रही आंतरिक हिंसा, कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और अंतरराष्ट्रीय मदद की कमी के चलते जमीनी स्तर पर मरीजों की ट्रैकिंग करना स्वास्थ्य टीमों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है [cite: क्यों मुश्किल हो रहा है संक्रमण को रोकना? यह प्रकोप कांगो के उस पूर्वी हिस्से में फैला है जहां लंबे समय से हिंसा और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। कई इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही कमजोर हैं। ऐसे में मरीजों तक समय पर इलाज पहुंचाना और संक्रमित लोगों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, फंडिंग में कमी और कई अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों के क्षेत्र छोड़ने से भी हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।

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