शासकीय विद्यालयों में धार्मिक मंत्रों का पाठ संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विरुद्ध : सुनाराम तेता

भानुप्रतापपुर। जनपद पंचायत भानुप्रतापपुर के अध्यक्ष सुनाराम तेता ने शासकीय विद्यालयों में किसी एक धर्म विशेष के मंत्रों या धार्मिक प्रार्थनाओं के पाठ को संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विपरीत बताते हुए इस विषय पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता जताई है। उन्होंने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी राष्ट्र है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और धर्म चुनने की स्वतंत्रता प्राप्त है। ऐसे में सरकारी विद्यालयों में किसी एक धर्म के मंत्रों को प्राथमिकता देना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
तेता ने कहा कि शासकीय विद्यालयों में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। इन संस्थानों का उद्देश्य विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच, तार्किक दृष्टिकोण, मानवता, समानता और संवैधानिक मूल्यों का विकास करना होना चाहिए। यदि किसी एक धर्म विशेष के मंत्रों का नियमित पाठ कराया जाता है, तो अन्य समुदायों के विद्यार्थियों में असहजता और भेदभाव की भावना उत्पन्न हो सकती है।
उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। विशेष रूप से अनुच्छेद 28 राज्य निधि से संचालित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है। इसलिए शासकीय विद्यालयों को किसी भी धर्म विशेष के प्रचार-प्रसार का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
सुनाराम तेता ने कहा कि वर्तमान समय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का युग है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), रोबोटिक्स, अंतरिक्ष अनुसंधान और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में शिक्षा व्यवस्था का मुख्य फोकस वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुसंधान और तकनीकी कौशल के विकास पर होना चाहिए।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 51(क)(ह) का हवाला देते हुए कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधार की भावना विकसित करना प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है। विद्यालयों को विद्यार्थियों में प्रश्न पूछने, शोध करने और नई खोजों के प्रति रुचि विकसित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
तेता ने कहा कि यदि नैतिक शिक्षा दी जानी है तो उसे सत्य, अहिंसा, करुणा, समानता, भाईचारा, पर्यावरण संरक्षण और संविधान के प्रति सम्मान जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी एक धार्मिक परंपरा पर।
उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार से मांग की कि शासकीय विद्यालयों में संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना, वैज्ञानिक सोच और समानता के सिद्धांतों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए तथा शिक्षा व्यवस्था को किसी भी प्रकार के धार्मिक पक्षपात से मुक्त रखा जाए। उन्होंने कहा कि देश का भविष्य आधुनिक, वैज्ञानिक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा से ही सुरक्षित और सशक्त बन सकता है।

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