रायपुर साहित्य उत्सव-2026 – सत्ता और साहित्य के बीच संतुलन की तलाश

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ की पहचान केवल खनिज, वन, आदिवासी संस्कृति और नदियों तक सीमित नहीं रही है। यह वह भूमि है जहाँ पंडित मुकुटधर पाण्डेय, डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध और विनोद कुमार शुक्ल जैसे रचनाकारों ने हिंदी साहित्य को नई दृष्टि, नई भाषा और नई संवेदना दी। लोक-भाषाओं की जीवंत परंपरा, छत्तीसगढ़ी कविता और लोकगीत आज भी इस सांस्कृतिक प्रवाह को जीवित रखे हुए हैं। ऐसे में राजधानी में ‘रायपुर साहित्य उत्सव-2026Ó का आयोजन स्वाभाविक रूप से बड़ी उम्मीदें पैदा करता है।
23, 24 और 25 जनवरी को नया रायपुर के मुक्ताकाशी मंच में आयोजित यह त्रि-दिवसीय आयोजन अपने आप में बड़ा है। 42 सत्र, 118 साहित्यकार-कलाकार, देश के प्रमुख प्रकाशन संस्थानों की भागीदारी और केंद्रीय विचार ‘आदि से अनादि तकÓ ये सभी तथ्य बताते हैं कि सरकार ने इसे एक साधारण औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन के रूप में गढऩे की कोशिश की है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता, राज्यसभा सांसद हरिवंश की उपस्थिति, मनोज जोशी का नाटक ‘चाणक्यÓ और मीडिया जगत की चर्चित हस्तियों के सत्र, इन सबके माध्यम से यह उत्सव व्यापक दर्शक वर्ग को आकर्षित करना चाहता है।

सरकारी साहित्य उत्सव: परंपरा और संकोच
यह सच है कि सरकारी संरक्षण में होने वाले साहित्य महोत्सवों को लेकर आमजन और बुद्धिजीवियों के मन में हमेशा एक स्वाभाविक संदेह रहा है। साहित्य का स्वभाव ही प्रश्नाकुल और आलोचनात्मक होता है। वह सत्ता से संवाद भी करता है और टकराव भी। यही कारण है कि सरकारें अक्सर ऐसे मंचों पर ‘सुविधाजनकÓ नामों को प्राथमिकता देती हैं—ऐसे नाम जो व्यवस्था के लिए असहज सवाल न खड़े करें। छत्तीसगढ़ में 2012 के बाद सरकारी स्तर पर बड़े साहित्य महोत्सव न होना भी इसी संकोच का संकेत माना जा सकता है। रायपुर साहित्य उत्सव को लेकर भी यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह एक वैचारिक रूप से विविध मंच बनेगा या केवल लोकप्रिय चेहरों और सत्ता-समर्थक वक्तव्यों का सरकारी औपचारिकता का आयोजन रह जाएगा। कुछ आलोचकों का बुलाए गए नामों को लेकर यह आरोप भी है कि इनमें से कई नाम ऐसे हैं जिनका गंभीर साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है और आयोजकों ने साहित्य से अधिक सेलिब्रिटी या मीडिया–राजनीति की दुनिया से जुड़े नामों को प्राथमिकता देखकर इस साहित्य की गंभीरता से दूर करने की कोशिश की है।

सेलिब्रिटी बनाम साहित्य
यह सवाल नया नहीं है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से लेकर कोलकाता, भोपाल, दिल्ली पुस्तक मेले और पटना साहित्य महोत्सव तक—हर जगह यह बहस रही है कि क्या साहित्य उत्सव धीरे-धीरे ‘इवेंट मैनेजमेंट और ‘पॉपुलर कल्चर की गिरफ्त में आ रहे हैं। बड़े नाम, टीवी चेहरे, फिल्म और रंगमंच के सितारे—ये भीड़ खींचते हैं, लेकिन क्या ये साहित्यिक विमर्श को गहराई देते हैं? इससे साहित्य का कोई हित होता है? रायपुर साहित्य उत्सव में भी मनोज जोशी, नीतीश भारद्वाज, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, रुबिका लियाकत, सुधांशु त्रिवेदी जैसे नाम इसी संदर्भ में देखे जा रहे हैं। लेकिन इनकी उपस्थिति को केवल नकारात्मक रूप में देखना शायद उचित नहीं। साहित्य उत्सव यदि केवल ‘क्लोज्ड सर्कलÓ बनकर रह जाए तो वह युवा पाठकों और आम समाज से कट जाता है। लोकप्रिय चेहरों के माध्यम से नए पाठकों को साहित्य के करीब लाना भी एक रणनीति हो सकती है। सवाल यह है कि क्या इनके साथ-साथ गंभीर, असहमति रखने वाले और वैचारिक रूप से स्वतंत्र साहित्यकारों को भी उतना ही स्थान मिलेगा?

विनोद कुमार शुक्ल: एक नैतिक प्रतीक
इस उत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसे विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति को समर्पित किया जा रहा है। विनोद कुमार शुक्ल केवल एक बड़े लेखक नहीं थे, बल्कि वे सत्ता, बाजार और शोर से दूर खड़े उस साहित्यिक विवेक के प्रतीक थे, जो बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बात कह देता है। मुख्यमंत्री द्वारा उनके पार्थिव शरीर को कंधा देना मुख्यमंत्री के बड़प्पन के साथ ही एक मानवीय और सांस्कृतिक संकेत था। यह समर्पण यदि केवल प्रतीकात्मक न होकर उनकी साहित्यिक दृष्टि, सरलता, संवेदना और स्वतंत्रता को मंच पर जीवित रख सके, तभी इसका अर्थ है। यदि छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग और साहित्य परिषद को अपना दायरा बढ़ा करना है और गागर में सागर भरने की सोच हो तो उन्हें अपने तमाम आयोजनों में साहित्य की राजनीति से पृथक होकर साहित्यिक और सांस्कृतिक उदारता के क्षेत्र में दाखिल होना होगा।

पुस्तकें, पाठक और नया रायपुर
राजकमल, वाणी, हिंदी युग्म, प्रभात प्रकाशन जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों की भागीदारी इस उत्सव की एक बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक मेले और साहित्य उत्सव का असली मूल्य वहीं से तय होता है। पुस्तकों और पाठकों के संवाद से। परंतु यहाँ एक व्यावहारिक सवाल भी है। नया रायपुर अभी भी आम जनता के लिए उतना सुलभ नहीं है। दूरी, परिवहन और शहर से कटाव—ये सभी बातें सहभागिता को सीमित कर सकती हैं। महाराष्ट्र या बंगाल जैसी साहित्यिक दीवानगी छत्तीसगढ़ या व्यापक हिंदी पट्टी में नहीं दिखती, यह भी एक यथार्थ है। ऐसे साहित्यिक आयोजनों का एक उद्देश्य यह भी होता चाहिए कि साहित्य के प्रति ऐसी दीवानगी और गहरी रुचि पैदा की जा सके बल्कि यह उद्देश्य प्राथमिकता में होना चाहिए। ऐसे में तीन दिन में 42 सत्रों की योजना कितनी व्यावहारिक है, यह भी विचारणीय है।

सराहना और सवाल—दोनों जरूरी
रायपुर जैसे शहर में इतना बड़ा साहित्य उत्सव होना अपने आप में एक सकारात्मक पहल है। सरकार यदि साहित्य और संस्कृति में निवेश कर रही है तो इसकी सराहना होनी चाहिए। यह भी सच है कि साहित्यिक मंचों पर पूरी वैचारिक स्वतंत्रता एक दिन में नहीं आती। लेकिन साथ ही, बुनियादी सवाल पूछना भी जरूरी है। क्या मंच पर असहमति की जगह है? क्या युवा, हाशिए के और गैर-लोकप्रिय लेखकों की आवाज सुनी जाएगी? क्या यह आयोजन एक चमकीला आम उत्सव या सिर्फ आयोजन की औपचारिकता बनकर रह जाएगा या छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना को दीर्घकालिक रूप से समृद्ध करेगा? क्या यह आयोजन देशभर के साहित्य हलको में एक गंभीर उपस्थिति की तरह दर्ज होगा? सरकार की मंशा ईमानदार है लेकिन उसकी परिणति कैसी होती है, यह देखना बाकी है।
‘आदि से अनादि तकÓ का विचार तभी सार्थक होगा जब यह उत्सव अतीत की विरासत, वर्तमान के सवाल और भविष्य की संभावनाओं, तीनों को ईमानदारी से जोड़े। साहित्य सत्ता का विस्तार नहीं, उसका नैतिक प्रतिपक्ष भी है। यदि रायपुर साहित्य उत्सव इस संतुलन को साध सका तो यह केवल तीन दिन का आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है।

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