कानून सख्त लेकिन दहेज हत्या जारी

-सुभाष मिश्र

भारत में दहेज विरोधी कानूनों की सूची लंबी है। कानून की किताबें मोटी हैं, अदालतों के फैसले कठोर हैं और सरकारों के भाषणों में महिला सुरक्षा की चमकदार घोषणाएं भरी पड़ी हैं। लेकिन इन सबके बीच एक भयावह सच लगातार हमारे सामने खड़ा है कि देश में आज भी दुल्हनें जल रही हैं, बेटियां मारी जा रही हैं और विवाह जैसे सामाजिक संबंध को खुले बाजार की तरह चलाया जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रतिदिन लगभग 16 से 20 महिलाएं दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा या संदिग्ध परिस्थितियों में अपनी जान गंवा रही हैं। यह सारे आंकड़े एक राष्ट्रीय शर्म की तरह हैं । भारतीय समाज के माथे पर लगा एक स्थायी कलंक है।
हाल की घटनाएं इस सड़ांध को और अधिक स्पष्ट करती हैं। भोपाल में नोएडा की रहने वाली ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत ने एक बार फिर दिखाया कि शिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार भी इस अपराध से मुक्त नहीं हैं। पीड़िता के परिवार का आरोप है कि वह प्रताड़ना से परेशान थी और वापस लौटना चाहती थी। मामले में रिटायर्ड जज और उनके वकील बेटे तक पर दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। यह भी सुना जा रहा है कि रिटायर्ड जज ने इस संबंध में अनेक जजों को फोन किया । आंध्र प्रदेश में एक महिला ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे दो बेटियों की मां होने और दहेज को लेकर लगातार ताने दिए जाते थे। ग्रेटर नोएडा के निक्की हत्याकांड में मर्सिडीज और पैंतीस लाख रुपये की मांग के लिए एक महिला को जिंदा जला दिया गया। जोधपुर की शिक्षिका संजू बिश्नोई ने अपनी तीन वर्ष की बेटी के साथ आत्मदाह कर लिया। जलपुरा में एक अन्य महिला की संदिग्ध मौत के बाद उसके परिवार ने फॉर्च्यूनर गाड़ी और इक्यावन लाख रुपये की मांग को कारण बताया। इन घटनाओं की भयावहता केवल हत्या में नहीं है बल्कि इस बात में है कि दहेज अब लालच की सामान्य भाषा बन चुका है। दहेज मांगने वालों को शर्म नहीं आती और जलाकर मार देना जैसे अपराध से बाहर हो गया हो । यह पुलिस और कानून व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है । पुलिस कथित रूप से इतनी निर्दय हो चुकी है कि वह ऐसे केस में पैसों के लोभ में आरोपी की तरफ हो जाती है । आरोपी के खिलाफ मजबूत केस करने के बजाय कथित सौदेबाजी होती है और केस कमजोर कर दिया जाता है जो अदालत में टिक नहीं पाता है। और यदि आरोपी की राजनीतिक पहुंच है तो फिर उसके हौसले और बढ़ जाते हैं बल्कि राजनीतिक पहुंच के कारण ही वह हत्या का साहस जुटा लेता है ।
दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल में कहा कि शादी के बाद छोटी गाड़ी और कम सोना लाने के ताने देना भी मानसिक क्रूरता है। यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज अक्सर मानसिक उत्पीड़न को मामूली पारिवारिक झगड़ा कहकर टाल देता है। दरअसल हत्या आग लगाने से पहले शुरू हो जाती है। वह रोज के अपमान, तानों, दबाव और आत्मसम्मान को कुचलने की प्रक्रिया में धीरे धीरे घटित होती है। दुल्हन को जलाने वाली आग पहले शब्दों में लगती है, बाद में चूल्हों और कमरों तक पहुंचती है।
भारत में वर्ष 2023 में छह हजार से अधिक दहेज संबंधी मौतें दर्ज हुईं। कई अध्ययनों के अनुसार 1999 से 2016 के बीच महिलाओं की कुल हत्याओं में चालीस से पचास प्रतिशत तक मामले दहेज हत्याओं से जुड़े रहे। यह स्थिति बताती है कि समस्या खत्म नहीं हुई बल्कि समाज ने इसे सामान्य बना लिया है।
दहेज का मूल उद्देश्य कभी नवविवाहित जीवन की सहायता माना गया होगा, लेकिन अब यह विवाह के नाम पर संगठित आर्थिक वसूली का निर्लज्ज अपराध बन चुका है। विवाह बाजार बन गया है जहां नौकरी की कीमत है, पद की कीमत है, जाति की कीमत है और विदेश में रहने की कीमत अलग है। यहां लड़की नहीं बेची जाती, उसके परिवार की आर्थिक क्षमता खरीदी जाती है। दुखद यह है कि समाज का बड़ा हिस्सा इसे अपराध नहीं बल्कि प्रतिष्ठा का प्रश्न मानता है।
इस पूरे संकट का सबसे खतरनाक पक्ष बढ़ती राजनीतिक उदासीनता है। चुनावों में धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद, राष्ट्रवाद और तमाम भावनात्मक मुद्दों पर घंटों बहस होती है, लेकिन दहेज हत्याएं शायद ही कभी राजनीतिक विमर्श का विषय बनती हैं। राजनीतिक दलों को जलती हुई दुल्हनों की चीखें वोट में बदलती दिखाई नहीं देतीं। इसलिए संसद में इस पर उतनी बेचैनी नहीं दिखती जितनी दिखनी चाहिए। महिला सुरक्षा केवल नारों तक सीमित है। नेताओं के भाषणों में बेटी बचाओ का शोर है, लेकिन दहेज के खिलाफ सामाजिक अभियान लगभग अदृश्य हैं।
पुलिस की घटती सक्रियता भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। अधिकांश मामलों में परिवार वर्षों तक शिकायतें दर्ज कराते रहते हैं, लेकिन कार्रवाई तब होती है जब महिला मर जाती है। पुलिस की कार्यप्रणाली में संवेदनशीलता के बजाय औपचारिकता बढ़ती दिखाई देती है। कई मामलों में शिकायतों को घरेलू विवाद कहकर टाल दिया जाता है। समाज भी यही करता है। लड़की को समझाया जाता है कि थोड़ा सहन करो, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन यह सहनशीलता अक्सर मृत्यु की प्रस्तावना बन जाती है।
पुलिस की घटती सक्रियता और आरोपी से गटजोड़ का का यह भयावह पक्ष अब जैसे बहुत ही सामान्य बात हो गई है । जिसके बारे में अब समाज में कोई भ्रम नहीं बचा है। यह कोई नई बात नहीं रह गई है। दहेज हत्या जैसे मामलों में जब आरोपी पक्ष संपन्न परिवारों से आता है या उसका संबंध किसी प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति से होता है, तब स्थिति पीड़िता या उसके परिवार के लिए और अधिक चिंताजनक हो जाती है। ऐसे मामलों में अक्सर पुलिस निष्पक्ष जांच एजेंसी के बजाय प्रभावशाली परिवारों के हितों की कथित संरक्षक दिखाई देने लगती है। शिकायतों को कमजोर करना, सबूतों को हल्का करके देखना, मामले को पारिवारिक विवाद बताना या कार्रवाई में देरी करना एक असामान्य घटना नहीं रह गई है। राजनीति और पुलिस का यह अदृश्य गठबंधन कई बार मृत लड़की के परिवार को न्याय से पहले ही हरा देता है। विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का काम अपराधी को कानून के सामने खड़ा करना है, वही व्यवस्था कई बार उसके लिए सुरक्षा कवच बन जाती है। तब न्याय केवल अदालत की फाइलों में रह जाता है । क्या कारण है कि आम जनता का विश्वास पुलिस प्रशासन से उठ गया है ? कानून उसके लिए संदिग्ध हो गया है ! आम व्यक्ति और खास करके व्यवस्था से पीड़ित व्यक्ति का शासन प्रशासन से विश्वास जैसे उठ गया है । दुख और शर्म की बात यह है कि प्रशासन को इसकी चिंता नहीं है । लोग कहते हैं कि वह एक कथित निर्लज खामोशी और लाचार बना बैठा है ।
सबसे दुखद तथ्य यह है कि दहेज हत्या केवल अपराध नहीं बल्कि सामूहिक सामाजिक विफलता है। इसमें अपराधी केवल पति या ससुराल वाले नहीं हैं। इसमें वह समाज भी शामिल है जो दहेज लेने वालों को सम्मान देता है, वह राजनीति भी शामिल है जो इस पर चुप रहती है और वह प्रशासन भी जो घटनाओं के बाद जागता है।
दहेज मांगने वाले परिवारों का सार्वजनिक बहिष्कार होना चाहिए। राजनीतिक दलों को इसे चुनावी और सामाजिक मुद्दा बनाना होगा। पुलिस को केवल केस दर्ज करने वाली संस्था नहीं बल्कि रोकथाम की सक्रिय एजेंसी बनना होगा।
क्योंकि सवाल केवल बहू के जलने का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर एक सभ्य समाज कब तक अपनी बेटियों की चिताओं की राख पर खड़े होकर विकास और संस्कृति का उत्सव मनाता रहेगा।

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