-सुभाष मिश्र
भारत के लोकतंत्र में विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने वाले संस्थान नहीं होते, बल्कि वे उस बौद्धिक चेतना के केंद्र होते हैं जहाँ सत्ता से सवाल पूछे जाते हैं, नीतियों की समीक्षा होती है और न्यायिक राजनीतिक फैसलों पर विमर्श जन्म लेता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़ा ताज़ा विवाद—जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद लगे कुछ नारों ने राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर दिया—इसी विमर्श को एक बार फिर कठघरे में खड़ा करता है। सवाल केवल यह नहीं है कि नारे क्या थे, बल्कि यह भी है कि हम असहमति को किस दृष्टि से देखते हैं—लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में या राष्ट्र-विरोध के आरोप के रूप में। यह प्रसंग हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी, उसकी सीमाओं, और सत्ता व समाज के विवेक—तीनों पर एक साथ सोचने को मजबूर करता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब असहमति शोर में बदलती है और सत्ता उसे देशद्रोह के तराजू पर तौलने लगती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हालिया विवाद इसी परीक्षा का एक और अध्याय है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न दिए जाने के बाद जेएनयू परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन और उसमें लगाए गए कथित आपत्तिजनक नारों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा कहाँ समाप्त होती है और राज्य की संवेदनशीलता कहाँ से शुरू होती है।
घटना के वीडियो वायरल होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे प्रोवोकेटिव और शैक्षणिक वातावरण के प्रतिकूल बताते हुए पुलिस से एफआईआर की मांग की। वहीं, सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इसे अलगाववाद, देश-विरोध और न्यायपालिका के अपमान से जोड़ दिया। दिल्ली के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा और कपिल मिश्रा जैसे नेताओं ने प्रदर्शनकारी छात्रों को अलगाववादी और देश का दुश्मन तक करार दे दिया। दूसरी ओर, जेएनयू छात्रसंघ का कहना है कि नारे वैचारिक थे, किसी व्यक्ति विशेष पर व्यक्तिगत हमला नहीं थे, और हर साल 5 जनवरी की कैंपस हिंसा की बरसी पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं।
यहीं से असल बहस शुरू होती है। क्या किसी न्यायिक फैसले से असहमति जताना अपने-आप में सुप्रीम कोर्ट का अपमान है? क्या मुर्दाबाद जैसे नारे—जो दशकों से कर्मचारी आंदोलनों, छात्र संघर्षों, किसान आंदोलनों और यहाँ तक कि संसद के बाहर भी सुनाई देते रहे हैं—अचानक राष्ट्र विरोधी हो गए हैं? क्या यही मानक हर जगह और हर दल पर समान रूप से लागू होता है?
यह भी उतना ही सच है कि किसी भी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी निरंकुश नहीं होती। संविधान स्वयं उचित प्रतिबंधों की बात करता है—सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, और हिंसा के उकसावे से बचाव के लिए। यदि कहीं स्पष्ट रूप से राष्ट्र विरोधी, हिंसक या घृणास्पद नारे लगते हैं, तो कार्रवाई होनी चाहिए। इस पर कोई विवाद नहीं है। सवाल यह है कि क्या पूरे एक संस्थान को, उसकी बौद्धिक परंपरा को, और हजारों छात्रों को कुछ वीडियो क्लिप्स के आधार पर कटघरे में खड़ा कर देना न्यायसंगत है?
जेएनयू पिछले एक दशक से एक स्थायी नैरेटिव का शिकार रहा है कि वह वामपंथियों का अड्डा, टुकड़े-टुकड़े गैंग या देश-विरोधी फैक्ट्री है। हर बार जब कुछ छात्र सरकार या राज्य की नीतियों पर सवाल उठाते हैं, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बिना तथ्यात्मक पड़ताल के पूरे कैंपस को कठघरे में खड़ा कर देता है। यह वही मीडिया है जो शायद ही कभी यह बताता है कि जेएनयू के छात्र देश की प्रशासनिक सेवाओं, विज्ञान, कूटनीति और अकादमिक दुनिया में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यह चयनात्मक प्रस्तुति न तो पत्रकारिता है और न ही लोकतंत्र के लिए स्वस्थ।
यहां एक बुनियादी सवाल यह भी है कि क्या जेएनयू के छात्र यह नहीं समझते कि ऐसे नारों की कीमत क्या हो सकती है—जेल, मुकदमे, और बर्बाद होता भविष्य। जेएनयू के छात्र नासमझ नहीं हैं। वे जानते हैं कि उनके कई साथी वर्षों से विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों में हैं। फिर भी विरोध होता है, क्योंकि विश्वविद्यालय केवल डिग्री लेने की जगह नहीं होते; वे सामाजिक विवेक के केंद्र भी होते हैं। हाँ, यह बहस जरूरी है कि क्या भावनात्मक, उग्र और प्रतीकात्मक नारों के बजाय अधिक तर्कपूर्ण, रचनात्मक और राजनीतिक रूप से प्रभावी तरीकों से असहमति दर्ज कराई जा सकती है। यह आत्मालोचना छात्रों को भी करनी होगी।
लेकिन इससे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या असहमति जताने वाले हर समूह को—खासकर यदि वे मुस्लिम, दलित, आदिवासी या सरकार-विरोधी हों—एक तयशुदा खलनायक की तरह पेश किया जाएगा? क्या जनरेशन या बचकाना कहकर उनकी राजनीतिक चेतना को खारिज कर देना समस्या का समाधान है, या यह सत्ता की असहजता को छिपाने का तरीका है? लोकतंत्र में युवा प्रश्न पूछते हैं, गलतियाँ करते हैं, सीखते हैं—यही उसकी ऊर्जा है। यदि हर सवाल को राष्ट्र विरोध कहकर दबा दिया जाएगा, तो अंतत: राष्ट्र को ही उसकी आलोचनात्मक आत्मा से वंचित कर दिया जाएगा।
जेएनयू विवाद हमें किसी एक निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि कई सवालों पर ले आता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग और उसका दमन—दोनों लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं। संतुलन नारेबाज़ी से नहीं, न ही टीवी स्टूडियो के शोर से बनेगा, बल्कि ठंडे दिमाग, तथ्यों और संवैधानिक मूल्यों से बनेगा। किसी संस्थान को निशाना बनाकर पूरे विचार-विमर्श को अपराध घोषित करना आसान है, लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती इसी में है कि हम असहमति को सहने की क्षमता विकसित करें—चाहे वह हमें असहज ही क्यों न करें।
इस पूरे प्रसंग को यदि केवल देशभक्ति बनाम देशद्रोह की सरल रेखा में समेट दिया गया तो न तो न्याय होगा, न ही लोकतंत्र मजबूत होगा। जरूरत इस बात की है कि हम अभिव्यक्ति, जिम्मेदारी और सत्ता—तीनों को एक ही संवैधानिक कसौटी पर परखें। यही विवेक लोकतंत्र को बचाता है और शायद यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी सीख भी है।