राम के ननिहाल में भी ‘जी राम जी’

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ की पहचान केवल ‘धान का कटोरा भर नहीं है। यह भगवान श्रीराम के ननिहाल के रूप में भी पूरे देश में विशेष सम्मान रखता है। मान्यता है कि माता कौशल्या की जन्मभूमि होने के कारण छत्तीसगढ़ में श्रीराम को भांजा माना जाता है और यहां भांजे का विशेष सम्मान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसे प्रदेश में जब ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी योजना का नाम बदलकर ‘विकसित भारत-गारंटी रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी ‘वीबी-जी राम जी रखा जाता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण कदम बन जाता है।
छत्तीसगढ़ लंबे समय तक सीमित सिंचाई और एक फसली कृषि व्यवस्था के कारण मजदूरों के पलायन का प्रदेश रहा है। धान की कटाई के बाद हजारों श्रमिक ईंट-भट्टों, निर्माण कार्यों और दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए निकल जाते थे। पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, प्रधानमंत्री आवास, स्वयं सहायता समूहों और अन्य योजनाओं के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार अवश्य आया है, लेकिन रोजगार की स्थायी चुनौती अभी भी बनी हुई है।
ऐसे समय में राज्य सरकार ने केंद्र के नए कानून के अनुरूप ‘जी राम जी योजना लागू करने का निर्णय लिया है। योजना के तहत प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिनों के अकुशल रोजगार की वैधानिक गारंटी मिलेगी। जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका परिसंपत्तियों का निर्माण और ग्राम पंचायत आधारित विकास इसके प्रमुख उद्देश्य होंगे। राज्य सरकार ने इसके लिए 4,000 करोड़ रुपये का बजट भी निर्धारित किया है तथा केंद्र और राज्य के बीच 60:40 के अनुपात में व्यय किया जाएगा।
सवाल यह नहीं है कि योजना का नाम क्या है। असली प्रश्न यह है कि क्या इससे गांवों की तस्वीर बदलेगी? क्या रोजगार वास्तव में मिलेगा? क्या बनने वाली परिसंपत्तियां टिकाऊ होंगी? क्या मजदूरों को समय पर भुगतान मिलेगा? क्या पंचायतों की जवाबदेही बढ़ेगी? यदि इन सवालों का उत्तर ‘हां है, तभी ‘जी राम जी सफल मानी जाएगी।
मनरेगा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कभी धन की कमी नहीं रही, बल्कि कई राज्यों में कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान में देरी, फर्जी जॉब कार्ड, अपूर्ण परिसंपत्तियां और राजनीतिक हस्तक्षेप रहे हैं। यदि वही कमियां नए नाम के साथ भी जारी रहती हैं, तो केवल नाम बदलने से ग्रामीण भारत की तस्वीर नहीं बदलने वाली। हालांकि इस नई योजना में डिजिटल सुशासन, विभागीय योजनाओं के अभिसरण और पीएम गति शक्ति जैसी पहल को जोडऩे का प्रयास सकारात्मक माना जा सकता है। यदि ग्राम पंचायतों की योजनाएं कृषि, जल संरक्षण, सड़क, आजीविका और स्थानीय उद्योगों से जुड़ें, तो गांवों में स्थायी आर्थिक गतिविधियां विकसित हो सकती हैं। इससे पलायन कम होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिलेगी।
छत्तीसगढ़ ने इस योजना के प्रारूप को मंजूरी देकर देश के सामने पहल अवश्य की है। आने वाले समय में दूसरे राज्य भी इसे अपनाते हैं या नहीं, यह काफी हद तक इसकी सफलता पर निर्भर करेगा। यदि ‘जी राम जी केवल कागजों तक सीमित रही तो यह भी अनेक योजनाओं की तरह एक और सरकारी घोषणा बनकर रह जाएगी। यदि इससे खेतों में पानी, गांवों में रोजगार, महिलाओं को आय और युवाओं को स्थानीय अवसर मिलते हैं, तो यह वास्तव में ग्रामीण विकास की नई कहानी लिख सकती है।
राम के ननिहाल की धरती से शुरू हुई यह पहल अब एक परीक्षा के दौर में है। यहां केवल ‘जय श्रीराम का भाव नहीं, बल्कि ‘जी राम जी के माध्यम से गांवों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी भी जुड़ गई है। अंतत: जनता नाम नहीं, परिणाम देखती है। यदि गांव मजबूत होंगे, किसान समृद्ध होंगे और मजदूरों को सम्मानजनक रोजगार मिलेगा, तभी इस योजना का उद्देश्य पूरा माना जाएगा। तभी कहा जा सकेगा कि राम के ननिहाल में ‘जी राम जी केवल अभिवादन नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि का नया संकल्प बन गया है।

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