-सुभाष मिश्र
पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध जैसे हालातों ने एक बार फिर दुनिया को उस कड़वे सच के सामने ला खड़ा किया है कि वैश्विक व्यवस्था आज भी ऊर्जा पर उतनी ही निर्भर है, जितनी दशकों पहले थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस संकट को लेकर जो चिंता जताई और देशवासियों से संयम व तैयारी की अपील की, उसके बाद स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में आशंका पैदा हुई। कोरोना जैसी तैयारी वाले बयान को कई लोगों ने संभावित लॉकडाउन से जोड़कर देखना शुरू कर दिया, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। यह संकट किसी महामारी का नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक अस्थिरता का है, जिसकी जड़ें पश्चिम एशिया के उस क्षेत्र में हैं, जहां से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन कही जाने वाली तेल-गैस की आपूर्ति संचालित होती है।
दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर मंडराता खतरा इस संकट का सबसे बड़ा कारण है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार रोजाना लाखों बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है और इंटरनेशल एनर्जी एजेंसी ने इसे दशकों का सबसे गंभीर ऊर्जा संकट करार दिया है। यह स्थिति केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके असर दुनिया के कई देशों में दिखने लगे हैं। फिलीपींस द्वारा नेशनल एनर्जी इमरजेंसी घोषित करना, श्रीलंका और पाकिस्तान में काम के घंटे घटाना, बांग्लादेश में ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देना और वियतनाम में वर्क फ्रॉम होम की सलाह ये सभी कदम इस बात के संकेत हैं कि दुनिया ऊर्जा बचत और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की ओर तेजी से बढ़ रही है।
भारत के लिए यह संकट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की भूमिका केंद्रीय रही है। हालांकि, बीते वर्षों में भारत ने इस निर्भरता को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। तेल-गैस के आयात स्रोतों को 27 से बढ़ाकर 41 देशों तक विस्तारित करना, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना और रिफाइनिंग क्षमता में वृद्धि करना ये सभी प्रयास इस बात के संकेत हैं कि देश ने संभावित संकटों को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारी को सुदृढ़ किया है। यही कारण है कि वर्तमान स्थिति में, चुनौतियों के बावजूद, घबराहट जैसी कोई परिस्थिति नहीं है।
फिर भी यह मान लेना भूल होगी कि यह संकट भारत को प्रभावित नहीं करेगा। होर्मुज मार्ग से आपूर्ति में बाधा का सीधा असर कीमतों और उपलब्धता पर पड़ सकता है। एलपीजी सिलेंडर को लेकर लंबी कतारों की खबरें इसी दबाव का प्रारंभिक संकेत हैं। ऐसे समय में सरकार द्वारा औद्योगिक गैस आपूर्ति में कटौती और घरेलू उपयोग के लिए एलपीजी उत्पादन बढ़ाने जैसे कदम संतुलन बनाने की कोशिश हैं। साथ ही, सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा संरक्षण के उपायों पर जोर देना इस बात का संकेत है कि भारत केवल तात्कालिक समाधान ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकल्पों की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
जहां तक लॉकडाउन की आशंका का सवाल है तो इसे लेकर स्पष्टता आवश्यक है। कोविड-19 जैसी स्थिति एक वैश्विक स्वास्थ्य आपदा थी, जिसमें संक्रमण की रोकथाम के लिए मानवीय गतिविधियों को सीमित करना अनिवार्य था। वर्तमान संकट का स्वरूप पूरी तरह अलग है। यह आपूर्ति, कीमत और संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। ऐसे में, भले ही परिस्थितियां और जटिल हों, समाधान लॉकडाउन नहीं, बल्कि प्रबंधन, संयम और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग में निहित होगा। हां, यदि संकट लंबा खिंचता है तो वर्क फ्रॉम होम, ऊर्जा खपत में नियंत्रण और गैर-जरूरी गतिविधियों में कटौती जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं, लेकिन यह महामारी जैसी पूर्ण बंदी की स्थिति नहीं होगी।
प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में जिस एकजुटता, धैर्य और सतर्कता की बात कही, उसका महत्व इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। संकट के समय केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज और नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। काला बाजारी और जमाखोरी जैसे तत्व ऐसे ही अवसरों की तलाश में रहते हैं, और यदि समय रहते इन पर नियंत्रण न किया जाए तो यह संकट को और गहरा कर सकते हैं। इसलिए प्रशासनिक सख्ती के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी है।
पश्चिम एशिया का यह संकट एक बार फिर यह याद दिलाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी परस्पर जुड़ी हुई है और किसी एक क्षेत्र में उत्पन्न अस्थिरता का असर कितनी तेजी से पूरी दुनिया पर पड़ता है। भारत के लिए यह एक चुनौती जरूर है, लेकिन उससे अधिक यह एक अवसर भी है ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में और तेजी से आगे बढऩे का, वैकल्पिक स्रोतों को अपनाने का और एक जिम्मेदार उपभोक्ता समाज के रूप में खुद को ढालने का। ऐसे समय में घबराहट नहीं, बल्कि समझदारी और सामूहिक प्रयास ही देश को हर संकट से उबारने की ताकत रखते हैं।