बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में शिक्षक के खिलाफ फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के निचले आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चिकित्सा विशेषज्ञता वाले मामलों में ‘दिव्यांगता मूल्यांकन बोर्ड’ जैसे सक्षम प्राधिकारियों की राय को उचित सम्मान देना चाहिए और उसी पर निर्भर रहना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
मामला महासमुंद जिले में कार्यरत सहायक अध्यापक लखन बिहारी पटेल से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को सुनने में समस्या थी, जिसके आधार पर वर्ष 2010 में मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 45.4 प्रतिशत दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी किया था। इसी आधार पर उनकी नियुक्ति शिक्षाकर्मी ग्रेड 3 के पद पर हुई थी। साल 2017 में पारिवारिक विवाद के चलते उनके भाई ने कलेक्टर से शिकायत की थी कि यह प्रमाणपत्र गलत है। जांच के बाद राजस्व अधिकारी ने 2018 की नई मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण चलाने की अनुशंसा की थी, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अधिकारी ने वर्ष 2010 के प्रमाणपत्र को अमान्य करने के लिए 2018 के मेडिकल टेस्ट पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया, जो कानूनी रूप से गलत है। कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगता कोई स्थिर स्थिति नहीं है और समय के साथ इसमें बदलाव संभव है। किसी पुराने और वैध प्रमाणपत्र को सिर्फ बाद के आकलन के आधार पर तब तक अमान्य नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि मूल प्रक्रिया में धोखाधड़ी या गलतबयानी के पक्के सबूत न मिलें। इस मामले में धोखाधड़ी का कोई कानूनी सबूत नहीं मिलने के कारण कोर्ट ने शिक्षक को राहत प्रदान की है।