सरकारी नियम बना जी का जंजाल: घरेलू गैस सिलेंडर के लिए दर-दर भटकने को मजबूर आम जनता, फूंक रहे चूल्हा

चारामा (कांकेर)। सरकार की नीतियां अक्सर कागजों पर तो बेहतरीन लगती हैं, लेकिन जब वे धरातल पर उतरती हैं, तो आम जनता के लिए जी का जंजाल बन जाती हैं। ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है एलपीजी घरेलू गैस सिलेंडर की रिफिलिंग को लेकर बनाए गए सरकार के नए नियम से। इस तुगलकी फरमान ने आम आदमी को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया है।

हाल ही में लागू किए गए नियम के मुताबिक, अब ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन और शहरी क्षेत्रों में 25 दिन से पहले दूसरा गैस सिलेंडर नहीं दिया जाएगा। लेकिन इस नियम के पीछे की व्यावहारिक दिक्कतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है, जिसका खामियाजा अब आम जनता भुगत रही है।

चारामा क्षेत्र में गहराया संकट: ‘शहरी’ होकर भी ‘ग्रामीण’ नियम की मार
इस अव्यावहारिक नियम का सबसे बड़ा और अनोखा उदाहरण चारामा क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। चारामा भौगोलिक, व्यापारिक और व्यावहारिक रूप से एक शहरी क्षेत्र है, लेकिन यहाँ जो गैस वितरण केंद्र संचालित है, वह ग्रामीण वितरक (Rural Distributor) की श्रेणी में आता है।

नतीजा यह है कि चारामा के शहरी निवासियों को भी कागजों पर ग्रामीण मानकर 45 दिन वाले नियम के तहत बांध दिया गया है। अब यहाँ के लोगों को चाहकर भी 45 दिन से पहले एजेंसी से सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है।

45 दिन का गणित और आम आदमी की बेबसी
“क्या सरकार को नहीं पता कि एक सामान्य परिवार में सिलेंडर 45 दिन नहीं चलता? फिर क्यों जनता पर यह जबरन नियम थोपा गया?” यह तीखा और जायज सवाल आज चारामा का हर आम नागरिक जनधारा न्यूज़ के माध्यम से प्रशासन से पूछ रहा है।

जिन परिवारों में सदस्यों की संख्या ज्यादा है, वहाँ सिलेंडर 25 से 30 दिन के भीतर ही दम तोड़ रहा है। ऐसे में बाकी के 15 दिन वो परिवार कैसे गुजारे? लोग अब फिर से पुराने दौर में लौटने को मजबूर हैं। कोई इंडक्शन चूल्हे पर भारी-भरकम बिजली बिल भरने को मजबूर है, तो कोई लकड़ियाँ जुटाकर चूल्हा फूंक रहा है और अपना काम चला रहा है। सरकार द्वारा बस एक नियम लागू कर दिया गया, लेकिन आम पब्लिक की परेशानियों को ध्यान में नहीं रखा गया।

सामाजिक ताना-बाना टूटा: खुशियों के आयोजनों पर लगा ‘ग्रहण’
इस नियम ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को भी गहरी चोट पहुंचाई है। पहले किसी के घर में शादी-ब्याह, पूजा-पाठ या कोई छोटा-मोटा आयोजन होता था, तो लोग आस-पड़ोस या रिश्तेदारों से सिलेंडर लेकर काम चला लेते थे और आपसी सहयोग से आयोजन सफल हो जाता था।

लेकिन अब? अब कोई किसी की मदद करने को तैयार नहीं है। सबको चिंता अपने घर की है कि अगर अपना सिलेंडर किसी को दे दिया, तो अगले 45 दिनों तक उनके अपने घर में चूल्हा कैसे जलेगा। इस डर से सब जैसे बंध से गए हैं और लोग अपने घरों में कोई मांगलिक आयोजन करने से भी कतराने लगे हैं।

वितरक मजबूर, आम जनता बेकसूर
जब परेशान जनता गैस एजेंसियों के चक्कर काट रही है, तो वितरक और डीलर भी बेबस नजर आ रहे हैं। जनधारा न्यूज़ से बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि सॉफ्टवेयर और सरकारी ऑनलाइन पोर्टल के आगे उनके हाथ बंधे हैं। नियम का हवाला देकर वे चाहकर भी उपभोक्ताओं को समय से पहले वैध तरीके से सिलेंडर जारी नहीं कर पा रहे हैं।

जनता की हुंकार: “45 दिन का नियम बदले सरकार, पूर्व की तरह मिले सिलेंडर”
“जाएं तो जाएं कहां?” यह बेबसी और आक्रोश आज हर आम आदमी के चेहरे पर साफ देखा जा सकता है। बिना जमीनी हकीकत जाने थोपे गए इस नियम से जनता में भारी नाराजगी है।

चारामा सहित तमाम प्रभावित क्षेत्रों की जनता ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि:

इस अव्यावहारिक 45 दिन के नियम को सरकार तुरंत वापस ले और ग्रामीण वितरक क्षेत्र के नियमों को बदलकर इसे 25 दिन किया जाए।

सरकार इस व्यवस्था में तुरंत परिवर्तन करे और पूर्व की तरह ही सामान्य रूप से आम नागरिकों को सिलेंडर देना सुनिश्चित करे ताकि जनता को इस मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से राहत मिल सके।

विशेष ग्राउंड रिपोर्ट
संवाददाता: अनुप कुमार वर्मा, चारामा
जनधारा न्यूज़

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