गुंडागर्दी में लड़कियों की एंट्री

(नया स्टेटस सिम्बल)

-सुभाष मिश्र

पहली बार में यह शीर्षक आपको चौंका सकता है, लेकिन विगत कुछ वर्षों की घटनाओं को ध्यान से देखेंगे या जानकारी पाएंगे तो आपको लगेगा कि सामान्य अपराध से लेकर बड़े अपराधों तक में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ी है। पिछले कुछ वर्षों में फिल्मों से लेकर ओटीटी तक में जिस तरह से अपराध का महिमामंडन हुआ है और जिस तरह से अपराधियों की ताकत, उनकी स्टाइल और उन्हें एंटी हीरो की तरह जो बताया गया है। समाज में युवा वर्ग का एक हिस्सा उसके मोहपाश में है। कुछ युवा इसे स्टेटस सिंबल की तरह देखने लगे हैं। दुर्भाग्य यह है कि अब इसमें लड़कियों को भी आकर्षक नजर आ रहा है। अब अपराध में लड़कियों की भी एंट्री हो गई है। कॉलेज के झगड़े सड़कों पर आ गए हैं और झगड़ों में गालियां देना, मारपीट करना एक विशिष्ट स्टाइल मानी जाती है। अधिकांश लड़कियों को अब गंदी गालियां देने में कोई एतराज नहीं है, बल्कि इसे वे आधुनिकता का एक हिस्सा मानती हैं। समाज परिवर्तनशील है। समय के साथ उसके मूल्य, उसकी प्राथमिकताएँ और उसकी जीवनशैली बदलती रहती है। पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, राजनीति, विज्ञान, सेना, खेल, न्यायपालिका और प्रशासन जैसे लगभग हर क्षेत्र में नई ऊँचाइयों तक पहुँचते देखा है। यह परिवर्तन न केवल स्वागतयोग्य है, बल्कि एक आधुनिक और लोकतांत्रिक समाज की पहचान भी है।
लंबे समय तक हिंसा, गैंगवार, रंगदारी, हथियारबाजी और संगठित अपराध को पुरुषों की दुनिया माना जाता रहा। महिलाएँ यदि अपराध में दिखाई भी देती थीं तो प्राय: किसी अपराधी की सहयोगी, परिस्थितियों की शिकार या मजबूरी में शामिल व्यक्ति के रूप में। लेकिन अब देश के अनेक हिस्सों से जो घटनाएँ सामने आ रही हैं, वे एक नए सामाजिक बदलाव की ओर संकेत है। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में पुलिस की कार्रवाई में ऐसी युवतियाँ सामने आई हैं जो हनीट्रैप, गैंग ऑपरेशन, ड्रग्स नेटवर्क, रंगदारी, हथियारों के प्रदर्शन और कुछ मामलों में हिंसक अपराधों तक में सक्रिय भूमिका निभाती दिखाई देती हैं।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक रोचक दृश्य बना दिया है। इंस्टाग्राम और अन्य मंचों पर हथियारों के साथ रील बनाना, लग्जरी गाडिय़ों में स्टंट करना, गैंगस्टर जैसी छवि प्रस्तुत करना, गाली-गलौज और आक्रामक व्यवहार का प्रदर्शन करना अब केवल कुछ लड़कों तक सीमित नहीं रह गया है। कुछ युवतियाँ भी इस प्रदर्शनवादी संस्कृति का हिस्सा बनती दिखाई दे रही हैं। अपराध अब कई बार शक्ति, प्रसिद्धि और प्रभाव का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उसकी वास्तविक मंजि़ल जेल, हिंसा और बर्बादी के अतिरिक्त कुछ नहीं होती है।
यहाँ एक तथ्य स्पष्ट कर देना आवश्यक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के उपलब्ध आँकड़े यही बताते हैं कि हत्या, डकैती, लूट, गंभीर मारपीट और संगठित हिंसक अपराधों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि महिलाएँ अपराध में पुरुषों के बराबर पहुँच गई हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि संगठित अपराध, साइबर अपराध, हनीट्रैप, ड्रग्स नेटवर्क और स्थानीय दबंगई जैसे कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। यही बदलाव चिंता का विषय है। इससे बड़ी चिंता का विषय यह है कि लड़कियों को अपराध में आनंद आने लगा है। अपराध अब डर और शर्मिंदगी का कारण नहीं है। वे इसमें प्रसिद्धि देख रही हैं। फिल्मों और ओटीटी पर ही नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में भी समाज में प्राय: कथित रूप से पुलिस को जिस तरह अपराधियों से मिलीभगत में या उनके आगे लगभग समर्पित मुद्रा में जैसा बताया और देखा जा रहा है, इन सब बातों ने भी पुरुषों के अलावा स्त्रियों के भीतर से भी कानून का डर खत्म किया है और इसे पैसा, पॉवर और प्रसिद्धि की चाह में देखना शुरू किया है।
इसके कई कारण हैं। सोशल मीडिया पर अपराध का ग्लैमर, रातों-रात प्रसिद्धि पाने की चाह, बहुत जल्दी यानी रातों-रात अमीरी का आकर्षण, सुख सुविधा वाली जीवनशैली, परिवारों की गरीबी और कमजोर होता सामाजिक नियंत्रण, बेरोजगारी, समृद्ध परिवार की लड़कियों को पॉवर का, रौब का आकर्षक दिखाना और अपराधियों द्वारा गरीब घर की लड़कियों को बरगलाना, गैंगों द्वारा महिलाओं का रणनीतिक उपयोग, इसके अलावा इसमें अंतरराष्ट्रीय अपराध भी शामिल हैं। ड्रग्स के अवैध कारोबार में अकूत यानी अपार राशि मिलती है। यह अधिकांश युवाओं को आकर्षित करती है और इस आकर्षण में अब लड़कियां भी फंस रही हैं। अंतरराष्ट्रीय अपराधी और कुछ दुश्मन देश एक रणनीति के तहत पहले युवाओं को नशे की लत लगाते हैं। फिर उसे अपराध में धकेलते हैं। ये सभी कारण मिलकर नई मानसिकता तैयार कर रहे हैं। अपराध अब कुछ युवाओं को अमीरी के लिए मेहनता और संघर्ष की बजाय शॉर्टकट का रास्ता दिखाई देने लगा है।
चिंता का विषय केवल इतना नहीं है कि कुछ लड़कियाँ गुंडागर्दी कर रही हैं। असली चिंता यह है कि समाज में हिंसा का आकर्षण बढ़ रहा है। कभी पुरुष हिंसा के पर्याय माने जाते थे और स्त्रियाँ उसकी सबसे बड़ी पीडि़त होती थीं। आज भी महिलाओं के विरुद्ध अपराध एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती हैं, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी दिखाई दे रहा है कि समाज का एक छोटा वर्ग ऐसा भी है, जहाँ कुछ महिलाएँ स्वयं हिंसा, दबंगई और अपराध को शक्ति प्रदर्शन का माध्यम मानने लगी हैं। यह परिवर्तन सामाजिक मनोविज्ञान के स्तर पर गंभीर अध्ययन का विषय है।
आज महिलाएँ हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। यह परिवर्तन भारतीय समाज की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, लेकिन समानता का अर्थ यह कभी नहीं हो सकता कि अपराध, हिंसा, नशाखोरी, हथियारबाजी या गुंडागर्दी में भी बराबरी स्थापित की जाए। यदि पुरुष का अपराध गलत है तो महिला का अपराध भी उतना ही गलत है। अपराध में स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता; उसका केवल एक ही नाम है अपराध। आज सोशल मीडिया पर अश्लीलता, अभद्र भाषा, झूठे आरोप, डिजिटल ब्लैकमेल, ट्रोलिंग, चरित्रहनन और शक्ति प्रदर्शन जैसी प्रवृत्तियों में भी स्त्री और पुरुष दोनों की भागीदारी दिखाई देती है। यह पूरे समाज के नैतिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि लड़कियाँ गुंडई क्यों कर रही हैं। असली प्रश्न यह है कि हमारा समाज ऐसा क्यों बनता जा रहा है, जहाँ कुछ युवाओं , चाहे वे लड़के हों या लड़कियाँ, को गुंडागर्दी, हिंसा और अपराध सफलता, प्रतिष्ठा और शक्ति का आसान रास्ता दिखाई देने लगा है। यदि इस प्रश्न का उत्तर हम समय रहते नहीं खोज पाए, तो आने वाले वर्षों में चिंता केवल अपराध की नहीं होगी, बल्कि उस सामाजिक चेतना की होगी जिसने अपराध को ही आकर्षण बना दिया।

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