हिंदू धर्म में रविवार का दिन प्रत्यक्ष देवता सूर्य देव की आराधना के लिए बेहद विशेष माना गया है। मान्यता है कि इस दिन पूरी निष्ठा से सूर्य देव की पूजा करने से व्यक्ति को मान-सम्मान, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। हालांकि, शास्त्रों में सूर्य देव को अर्घ्य देने के कुछ कड़े नियम बताए गए हैं। अगर जल अर्पित करते समय इन नियमों की अनदेखी की जाए, तो पूजा का पुण्य फल नष्ट हो सकता है। आइए जानते हैं सूर्य देव को जल देने की सही विधि और उन गलतियों के बारे में जिनसे आपको बचना चाहिए।
इस सही विधि से दें सूर्य देव को अर्घ्य
सूर्य देव को जल अर्पित करने के लिए हमेशा तांबे के पात्र का ही इस्तेमाल करना चाहिए। तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत (चावल) और लाल रंग के फूल मिला लें। इसके बाद दोनों हाथों से लोटे को पकड़कर अपने सिर की ऊंचाई तक ले जाएं और पूर्व दिशा की ओर मुख करके जल की धार छोड़ें। अर्घ्य देते समय इस बात का ध्यान रखें कि आपकी नजरें गिरती हुई जल की धारा के बीच से सूर्य देव के दर्शन कर रही हों। जल चढ़ाते समय निरंतर ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ या ‘ॐ सूर्याय नमः’ मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें। पूजा की पूर्णता के लिए अर्घ्य के पश्चात आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए।
भूलकर भी न करें ये गलतियां
अक्सर लोग अनजाने में सूर्य देव को जल देते समय कुछ बड़ी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे उन्हें पूजा का लाभ नहीं मिल पाता। जल देते समय सबसे जरूरी बात यह है कि लोटे से गिर रही जल की बूंदें आपके पैरों पर बिल्कुल नहीं पड़नी चाहिए। इसके लिए आप नीचे कोई गमला या साफ पात्र रख सकते हैं। इसके अलावा, सूर्य देव को कभी भी स्टील, कांच या प्लास्टिक के बर्तनों से अर्घ्य नहीं देना चाहिए। जल हमेशा सूर्योदय के समय या सुबह के वक्त ही देना फलदायी होता है, दोपहर के समय जल चढ़ाना वर्जित माना गया है। हमेशा स्नान के बाद साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर ही सूर्य देव के सामने जाएं।