नई दिल्ली। भागदौड़ भरी जिंदगी, ऑफिस का तनाव और लगातार डेस्क पर बैठे रहने का कल्चर युवाओं में एक बड़े खतरे को बढ़ावा दे रहा है। हाल ही में आई एनएफएचएस-6 (NFHS-6) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में महिलाओं की औसत फर्टिलिटी रेट घटकर 1.9 पर आ गई है, जबकि इसे सामान्यतः 2 से ऊपर होना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बांझपन (इनफर्टिलिटी) के बढ़ते मामलों के पीछे एक बड़ी वजह आधुनिक जॉब कल्चर और उससे जुड़ा स्ट्रेस है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों को अपनी चपेट में ले रहा है।
आयुर्वेदिक डॉक्टर चंचल शर्मा के मुताबिक, कॉर्पोरेट रूटीन कई तरीकों से इंसानी फर्टिलिटी में रुकावट डाल रहा है। लगातार कई घंटों तक अपनी सीट पर बैठे रहने से पेल्विक एरिया (कमर के निचले हिस्से) में ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो जाता है, जिससे गर्भधारण की क्षमता प्रभावित होती है। इसके अलावा, रात-रात भर लैपटॉप और मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ देती है। मेलाटोनिन न सिर्फ बेहतर नींद के लिए जरूरी है, बल्कि यह महिलाओं के एग्स को सुरक्षित रखने वाला एक ताकतवर एंटीऑक्सीडेंट भी है।
अत्यधिक कॉफी पीने की आदत और करियर के चक्कर में देर से फैमिली प्लानिंग करने का फैसला भी इस संकट को बढ़ा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि 30 साल की उम्र के बाद महिलाओं में एग्स की संख्या और गुणवत्ता (AMH लेवल) तेजी से कम होने लगती है। वहीं, ऑफिस की डेडलाइन और लगातार मीटिंग्स के दबाव के कारण शरीर में कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है, जो ओव्यूलेशन साइकिल को पूरी तरह बाधित कर देता है। इसके अलावा, केमिकल या हेल्थकेयर इंडस्ट्री में काम करने वाले लोग अनजाने में हानिकारक तत्वों के संपर्क में आते हैं, जो हार्मोनल असंतुलन पैदा करते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि तनाव कम करने के उपाय ढूंढने और अपनी दिनचर्या में सुधार करने से ही इस जोखिम को कम किया जा सकता है।