रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी कर्मचारियों के नाम पर हुए सबसे बड़े लोन फ्रॉड में अब जांच की गति और भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्पश एडवाइजर्स और आरवी ग्रुप नाम की कंपनियों द्वारा कर्मचारियों को लुभावना ऑफर देकर किए गए इस घोटाले में लगभग 300 करोड़ रुपये का फर्जी लोन जारी किए जाने का अनुमान है।

आज की जनधारा की पड़ताल के बाद इस बड़े घोटाले का खुलासा हुआ था। इसके बाद कोतवाली पुलिस ने 4 अप्रैल 2025 को दो महिलाओं विभा वर्मा, पूजा यादव सहित प्रमुख आरोपी अभय कुमार गुप्ता उर्फ अभयकांत मुंशी, सुरेंद्र सिंह करियाम, मनोज कुमार भगत, और राकिब हुसैन उर्फ वासु को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि—
डेढ़ महीने बाद भी पुलिस यह नहीं पता लगा सकी है कि सरकारी कर्मचारियों से वसूली गई करोड़ों की रकम आखिर गई कहाँ?
इस धीमी जांच के बाद अब राज्य स्तर पर SIT गठन की मांग तेज हो गई है।
हाईकोर्ट की राहत के बावजूद पीड़ितों को नोटिस—दूसरी मुश्किल
फ्रॉड का शिकार हुए कर्मचारियों को हाईकोर्ट से अंतरिम राहत भले मिली हो, लेकिन बैंकों ने EMI भुगतान के लिए लगातार नोटिस भेजना बंद नहीं किया है।
रकम बरामद न होने से पीड़ित दोहरी मार झेल रहे हैं।
मामले को RBI तक ले जाया गया है, जहां कर्मचारियों ने बैंकों पर भी साजिश और मिलीभगत का आरोप लगाया है।
बैंकों पर गंभीर आरोप—“हम बैंक गए ही नहीं, फिर भी लोन जारी हो गया”
पीड़ित कर्मचारियों ने लिखित शिकायत में बताया है कि—
- कंपनी ने आधार कार्ड, सैलरी स्लिप और पैन कार्ड गुमराह कर ले लिए।
- बैंक गए बिना ही उनके नाम पर लाखों का लोन मंजूर कर दिया गया।
- लोन जारी होने पर कर्मचारियों से केवल मोबाइल OTP मांगा गया।
- खाते में पैसा आते ही स्पश और RV ग्रुप ने आधी रकम अपने खाते में ट्रांसफर करा ली और कहा कि EMI कंपनी भरेगी।
इस “EMI कंपनी देगी” वाले जाल में फंसकर हज़ारों सरकारी कर्मचारी कर्ज में डूब गए।
कैसे हुआ 300 करोड़ का मेगा फ्रॉड?
एक साल पहले रायपुर के डीएम प्लाज़ा में स्पश एडवाइजर प्राइवेट लिमिटेड का ऑफिस खुला।
यहीं से एक स्कीम चलाई गई—
“लोन लो – EMI हम भरेंगे – 50% पैसा आपका”
और इसी लालच में बड़ी संख्या में शासकीय कर्मचारी इसके जाल में फंसते चले गए।
उदाहरण के तौर पर—50 लाख के लोन में से कर्मचारी को 25 लाख वापस दिए जाते और EMI का पूरा भार कंपनी उठाने का दावा करती।
लेकिन EMI कभी भरी ही नहीं गई और कर्मचारियों पर लाखों रुपये का कर्ज चढ़ गया।
कुछ कर्मचारियों ने तो आधा पैसा कंपनी में ही FD करा दिया—जिससे उनका 100% नुकसान हो गया।
अब जांच पर उठ रहे हैं सवाल, SIT की मांग तेज
जमा रकम का सुराग न मिलना, बैंकों की चुप्पी और आरोपियों का जाल—इन सभी ने घोटाले की गहराई को और बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह घोटाला बैंकिंग सिस्टम की “मजबूत मिलीभगत” के बिना संभव ही नहीं था।
अब पीड़ितों और कई संगठनों की मांग है कि राज्य सरकार इस मामले में उच्च स्तरीय SIT गठित करे ताकि बैंकों, कंपनी और अन्य विभागों की भूमिका सामने लाई जा सके।