-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य गठन के 25 वर्षों बाद पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था लागू हो चुकी है। 23 जनवरी 2026 से प्रभावी इस नई प्रणाली के साथ प्रशासनिक स्तर पर बड़ा फेरबदल भी हुआ है। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी संजीव शुक्ला को रायपुर का पहला पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया गया है। यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि पुलिसिंग के दर्शन और सत्ता-संतुलन में बड़े परिवर्तन का संकेत है। सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में अपराध नियंत्रण को मजबूती दे पाएगी या फिर यह आधे-अधूरे प्रयोग के रूप में सीमित रह जाएगी।
आधा शहर, आधी कमिश्नरी
रायपुर में लागू किया गया कमिश्नरी मॉडल “आधा जिला–आधी व्यवस्था” का उदाहरण है। 21 थाने पुलिस कमिश्नर के अधीन आए हैं, जबकि 12 थाने अब भी एसपी सिस्टम में रहेंगे। यानी एक ही जिले में दो अलग-अलग पुलिसिंग मॉडल साथ-साथ चलेंगे। यही बिंदु इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा विवाद और कमजोरी भी है।
आईपीएस लॉबी पहले ही यह आशंका जता चुकी थी कि पूरे जिले में कमिश्नरी लागू किए बिना यह प्रणाली प्रभावी नहीं हो सकती। दो अलग-अलग स्ट्रक्चर का मतलब है—दो कमांड चेन, दो प्रशासनिक प्राथमिकताएं और फील्ड लेवल पर भ्रम। जब संसाधन और मैनपावर पहले से ही सीमित हों, तब यह बंटवारा पुलिस की क्षमता को बढ़ाने के बजाय कमजोर भी कर सकता है।
रायपुर के एक औसत थाने में जहां न्यूनतम 75 पुलिसकर्मियों की जरूरत मानी जाती है, वहां मौजूदा स्थिति में सिर्फ 30 से 35 का बल है। अब उसी बल का बंटवारा कमिश्नरी और ग्रामीण पुलिसिंग के बीच होगा। आशंका यह है कि फील्ड में पुलिस कम दिखेगी और अधिकारियों के दफ्तरों में स्टाफ बढ़ता जाएगा। अनुमान है कि रायपुर जिले को प्रभावी पुलिसिंग के लिए 7,500 से अधिक बल की जरूरत है—जो वर्तमान व्यवस्था से काफी दूर है।
अधिकार बढ़े, जिम्मेदारी भी
कमिश्नरी सिस्टम का मूल तर्क यही है कि पुलिस को मजिस्ट्रेटी अधिकार देकर निर्णय प्रक्रिया तेज की जाए। रायपुर पुलिस कमिश्नर को धारा 144 लागू करने, जुलूस-धरनों की अनुमति, जिला बदर, एनएसए, पैरोल, अवैध गतिविधियों पर सीधी कार्रवाई जैसे व्यापक अधिकार दिए गए हैं। यह अधिकार पुलिस को अधिक सशक्त बनाते हैं, लेकिन साथ ही जवाबदेही का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि शस्त्र और आबकारी लाइसेंस जैसे कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अभी भी कमिश्नर को नहीं दिए गए हैं। ऐसे में यह “पूर्ण कमिश्नरी” नहीं, बल्कि सीमित अधिकारों वाली व्यवस्था है।
अपराध के आंकड़े क्या कहते हैं?
यदि केवल आंकड़ों की बात करें, तो रायपुर में 2025 अपराध नियंत्रण के लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर वर्ष रहा। कुल अपराधों में लगभग 11 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, चोरी और नकबजनी जैसे गंभीर अपराधों में भी गिरावट आई है। नशे के अवैध कारोबार पर कार्रवाई और अंतरराज्यीय अपराधियों की गिरफ्तारी यह संकेत देती है कि पुलिस का ऑपरेशनल प्रदर्शन कमजोर नहीं था—even बिना कमिश्नरी सिस्टम के।
यही वह बिंदु है जो बहस को जन्म देता है। जब अपराध पहले ही घट रहे थे, तब क्या कमिश्नरी सिस्टम की आवश्यकता थी? या फिर यह भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए किया गया एक नीतिगत निवेश है?
देश के अनुभव क्या कहते हैं?
देश के कई बड़े शहर—मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, भोपाल, इंदौर—में कमिश्नरी सिस्टम लागू है। अनुभव बताते हैं कि जहां यह व्यवस्था पूरे शहर या पूरे जिले में स्पष्ट सीमाओं के साथ लागू हुई, वहां निर्णय प्रक्रिया तेज हुई और कानून-व्यवस्था पर पकड़ मजबूत हुई। लेकिन जहां इसे अधूरा या राजनीतिक-प्रशासनिक समझौतों के साथ लागू किया गया, वहां अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
एडीजी प्रदीप गुप्ता की अध्यक्षता वाली कमेटी ने भी रायपुर के लिए पूरे जिले में कमिश्नरी लागू करने की सिफारिश की थी, भुवनेश्वर मॉडल का हवाला देते हुए। उस रिपोर्ट पर न चर्चा हुई, न पुनर्विचार—यह अपने आप में प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़ा करता है।
रायपुर में पुलिस कमिश्नरी लागू होना एक ऐतिहासिक कदम है। यह पुलिस को अधिक अधिकार देता है, लेकिन साथ ही उससे अधिक दक्षता, संवेदनशीलता और पारदर्शिता की अपेक्षा भी करता है। अपराध नियंत्रण सिर्फ अधिकारों से नहीं, बल्कि संसाधनों, प्रशिक्षण और स्पष्ट संरचना से होता है।
यदि यह व्यवस्था पूरे जिले में लागू होती, पर्याप्त बल उपलब्ध कराया जाता और सीमाएं तार्किक ढंग से तय होतीं, तो कमिश्नरी सिस्टम अपराधियों में वास्तविक खौफ पैदा कर सकता था। फिलहाल, यह प्रयोग उम्मीद और आशंका के बीच खड़ा है।
अब असली परीक्षा मैदान में होगी—क्या बढ़े हुए अधिकार अपराध पर निर्णायक प्रहार कर पाएंगे, या फिर यह कमिश्नरी भी कागज़ी सुधार बनकर रह जाएगी? रायपुर की जनता इसका जवाब आने वाले महीनों में देखेगी।