नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि वोटर लिस्ट को अपडेट करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का अहम हिस्सा है और यह चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। कोर्ट ने SIR की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज करते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को सही ठहराया।
यह फैसला चीफ जस्टिस Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ ने सुनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह तय किया कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत मौजूदा रूप में SIR करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए SIR प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसकी प्रक्रिया सामान्य वोटर वेरिफिकेशन से अलग है। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग का काम मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना है ताकि चुनाव पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से हो सकें।
इस मामले में कोर्ट ने 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। फिलहाल बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान समेत कई राज्यों में यह प्रक्रिया जारी है।
इन याचिकाओं में कई राजनीतिक दलों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया था। याचिकाकर्ताओं में Yogendra Yadav, Mahua Moitra, Manoj Jha, K. C. Venugopal और Supriya Sule समेत कई नाम शामिल रहे।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को पहचान प्रमाण के तौर पर स्वीकार करने का भी निर्देश दिया था। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा। चुनाव आयोग को आधार की सत्यता जांचने का अधिकार रहेगा।