-सुभाष मिश्र
बस्तर आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। दशकों तक देश के सुरक्षा मानचित्र में ‘नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में पहचाना जाने वाला यह इलाका अब ‘विकास मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर को देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने की घोषणा की है। आय छह गुना बढ़ाने, हर आदिवासी महिला को गाय और भैंस देने, डेयरी नेटवर्क बनाने, गांवों तक योजनाओं की सीधी पहुंच, सड़क, इंटरनेट, शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार जैसे कई बड़े वादे किए गए हैं। सवाल यह नहीं कि ये योजनाएं गलत हैं या सही। असली सवाल यह है कि क्या यही बस्तर का अंतिम विकास मॉडल होगा?
बस्तर कोई साधारण भूभाग नहीं है। यह भारत की सबसे समृद्ध प्राकृतिक संपदा वाली धरती है। यहां लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन, वन संपदा, जल स्रोत, जैव विविधता और विशाल मानव संसाधन मौजूद हैं। यदि गुजरात अपने व्यापारिक कौशल और समुद्री तट के सहारे अमूल, फार्मा, पेट्रो-केमिकल और रिसर्च आधारित अर्थव्यवस्था बना सकता है, तो बस्तर केवल डेयरी आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक सीमित क्यों रहे? आखिर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लौह अयस्क जिस क्षेत्र में मिलता है, वहां राष्ट्रीय स्तर का मेटल रिसर्च सेंटर क्यों नहीं हो सकता? बैटरी टेक्नोलॉजी, रक्षा उत्पादन, खनिज अनुसंधान, वन औषधि विज्ञान, ट्राइबल हेल्थ और जलवायु अध्ययन के बड़े संस्थान बस्तर में क्यों नहीं स्थापित किए जा सकते?
यही वह बिंदु है जहां सरकार और विपक्ष के विकास दृष्टिकोण में अंतर दिखाई देता है। वर्तमान सरकार ‘समावेशी ग्रामीण विकासÓ और ‘सहकारिता आधारित अर्थव्यवस्था की बात कर रही है। यह मॉडल गांवों तक योजनाएं पहुंचाने, डेयरी, स्व-सहायता समूह, वन उपज और छोटे रोजगार के जरिए तत्काल आय बढ़ाने पर आधारित है। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि यह पूरा मॉडल अंतत: खनिज और वन संपदा को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। यह आशंका इसलिए भी पैदा होती है क्योंकि देश में पहले भी कई सार्वजनिक उद्योग धीरे-धीरे निजीकरण की ओर बढ़े हैं। भिलाई स्टील प्लांट और बालको जैसे उदाहरण लोगों की स्मृति में आज भी मौजूद हैं।
लेकिन बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कहीं और है। क्या बस्तर को सिर्फ ‘कच्चा माल देने वाला क्षेत्र बनाकर विकसित किया जाएगा, या उसे ‘ज्ञान और उद्योग आधारित क्षेत्र बनाया जाएगा? गुजरात में अमूल केवल दूध बेचने से सफल नहीं हुआ। उसके पीछे रिसर्च, प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग, कोल्ड चेन, मैनेजमेंट और बाजार व्यवस्था की पूरी संरचना थी। यदि बस्तर में डेयरी मॉडल लाना है तो उसके साथ फूड प्रोसेसिंग यूनिवर्सिटी, ट्राइबल एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर, जैविक खाद्य निर्यात नेटवर्क और वन उत्पाद आधारित उद्योग भी बनाने होंगे। केवल गाय और भैंस बांट देने से आर्थिक क्रांति नहीं आती।
बस्तर को असली बदलाव तब मिलेगा जब यहां देश के शीर्ष संस्थान आएंगे। जैसे हैदराबाद में पुलिस अकादमी है, वैसे ही बस्तर में जंगल युद्ध, आपदा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा पर राष्ट्रीय संस्थान बन सकते हैं। यहां ट्राइबल मेडिकल साइंस इंस्टीट्यूट बन सकता है, क्योंकि आदिवासी स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा अध्ययन यहीं संभव है। लौह अयस्क आधारित ग्रीन स्टील टेक्नोलॉजी, बैटरी निर्माण और रक्षा धातु अनुसंधान केंद्र यहां स्थापित किए जा सकते हैं। दुनिया भर में ‘रेयर मिनरल इकॉनमी पर काम हो रहा है, लेकिन बस्तर अभी भी प्राथमिक खनन तक सीमित है। यह सबसे बड़ी विडंबना है। अभी दुनिया में महिलाओं के सौंदर्य की बहुत सारी हर्बल सामग्री लोशन आई ब्रो बहुत मंहगे दाम में तैयार करके पैकेजिंग के साथ एयरपोर्ट, बड़े बड़े मॉल में बेचे जा रहे है। बस्तर में तमाम तरह की जड़ी बूटी है आदिवासी महिलाओं के समूह बनाकर इसे बड़े उत्पादों के रूप में पूरी दुनिया में बेचा जा सकता है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ‘नरवा, गरुवा, घुरुवा और बाड़ी योजना हो या वर्तमान सरकार का डेयरी और सहकारिता मॉडल दोनों की सोच गांव आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की रही है। लेकिन 21वीं सदी में केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था किसी क्षेत्र को ‘राष्ट्रीय शक्ति केंद्र नहीं बनाती। इसके लिए शिक्षा, अनुसंधान, टेक्नोलॉजी, उद्योग और स्थानीय मानव संसाधन का उच्च स्तरीय विकास जरूरी होता है।
यह भी सच है कि माओवादी हिंसा कम होने से पहली बार बस्तर में निवेश, पर्यटन और आधारभूत संरचना के विस्तार की वास्तविक संभावना बनी है। सड़क, इंटरनेट और बैंकिंग पहुंच बढऩे से प्रशासनिक दूरी कम होगी। लेकिन विकास केवल सड़क बनाने से नहीं होता। विकास तब होता है जब स्थानीय युवा अपने ही क्षेत्र में वैज्ञानिक, इंजीनियर, रिसर्चर, उद्यमी और नीति निर्माता बनते हैं। यदि बस्तर का प्रतिभाशाली युवा पढ़ाई के लिए रायपुर, हैदराबाद या दिल्ली भागने को मजबूर रहेगा, तो ‘सबसे समृद्ध संभाग का सपना अधूरा रहेगा।
बस्तर के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या उसे केवल डेयरी, वन उपज और योजनाओं पर आधारित अर्थव्यवस्था तक सीमित रखा जाएगा, या उसे भारत के भविष्य के ‘संसाधन एवं अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा? यदि सरकार सचमुच बस्तर की आय छह गुना बढ़ाना चाहती है, तो उसे केवल पशुपालन नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा, खनिज मूल्य संवर्धन, अनुसंधान, तकनीकी संस्थान, आधुनिक उद्योग और स्थानीय भागीदारी पर आधारित मॉडल बनाना होगा।
बस्तर को दया नहीं, अवसर चाहिए। सहायता नहीं, संस्थान चाहिए। योजनाएं नहीं, दीर्घकालिक दृष्टि चाहिए। क्योंकि जिस धरती में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ खनिज और सबसे समृद्ध जंगल हैं, वह केवल ‘पिछड़ा इलाका नहीं रह सकती। सवाल अब यह नहीं कि बस्तर विकसित होगा या नहीं। सवाल यह है कि बस्तर का विकास किसके लिए होगा स्थानीय लोगों के लिए या केवल संसाधनों के दोहन के लिए?