सुशासन के दावों के बीच नौनिहालों का भविष्य, फाइलों में दबे 30 से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन

चारामा। एक तरफ सरकार ‘सुशासन तिहार’ मनाकर विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण और नगर विकास की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। चारामा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले कई आंगनबाड़ी केंद्र आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। मजदूर, किसान और गरीब परिवार के नौनिहालों का प्रारंभिक, बौद्धिक, शारीरिक और मानसिक विकास जिन केंद्रों में होना चाहिए, वे खुद सरकारी उदासीनता के कारण ढहने की कगार पर हैं।


​लिलेझर शिविर में उठी मांग, सरपंच के कच्चे मकान में लग रहा केंद्र
​ताजा मामला ग्राम पंचायत भोथा का है, जहां पूर्व सरपंच राजेश्वरी नेताम ने जनसमस्या निवारण शिविर लिलेझर (2024) में आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक-01 के लिए नवीन भवन की पुरजोर मांग की थी। वर्ष 2024 से भी पहले से यह भवन अत्यंत जर्जर स्थिति में है, जिसकी छत से पानी टपकता है और मलबे गिरते रहते हैं। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि वर्तमान में यह आंगनबाड़ी केंद्र सरपंच के एक कच्चे मकान में संचालित करने को मजबूर होना पड़ रहा है। वर्ष 2024 से शुरू हुआ यह संकट आज 2026 में भी जस का तस बना हुआ है और जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं।


​आंकड़ों की जुबानी: ताले लटके, किराए और उधारी के भरोसे नौनिहाल
​पूरे चारामा विकासखंड में कुल 219 आंगनबाड़ी केंद्र स्वीकृत हैं, जिनमें से लगभग 30 भवनों की स्थिति अत्यंत जर्जर हो चुकी है। इन जर्जर भवनों में मासूम बच्चों को बैठाना सीधे-सीधे मौत को दावत देने जैसा है। यही वजह है कि आज कई अत्यंत जर्जर केंद्रों में डर के मारे ताले लटक रहे हैं, तो कुछ भवन सालों से सरकारी मरम्मत की ‘बाट जोह’ रहे हैं। नौनिहालों की पढ़ाई बंद न हो, इसके लिए कई केंद्र भारी अव्यवस्था के बीच किराए के मकानों में चल रहे हैं, तो कई उधारी के मकानों और झोपड़ियों में जैसे-तैसे संचालित हो रहे हैं। बदहाली का आलम यह है कि चारामा नगर पंचायत के ही 10 में से 4 भवन अत्यंत जर्जर स्थिति में हैं। जब शहरी सीमा का यह हाल है, तो अंदरूनी गांवों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।


​अधिकारियों का वर्जन: उच्च स्तर पर लंबित है स्वीकृति
​इस पूरे मामले में जब चारामा की बाल विकास परियोजना अधिकारी से संपर्क किया गया, तो उन्होंने विभाग की ओर से प्रस्ताव भेजे जाने की बात स्वीकार की। बाल विकास परियोजना अधिकारी सुश्री गंगा पोया ने बताया कि— “हमारे द्वारा बीते वर्ष 2025 में ही मांग पत्र के अनुसार पूरे विकासखंड में लगभग 25 से अधिक जर्जर आंगनबाड़ी केंद्रों का पूर्ण निरीक्षण कर और विस्तृत फाइल तैयार कर उच्च अधिकारियों को सौंप दी गई है। शासन स्तर से अभी तक हमें किसी प्रकार की स्वीकृति प्राप्त नहीं हो पाई है। फिलहाल सभी आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। कुछ आंगनबाड़ी केंद्र जो भवन सही हैं वहां चल रहे हैं, कुछ किराए के मकानों पर संचालित हैं, तो कुछ ग्रामीण व्यवस्था के तहत अन्यत्र जगहों पर संचालित हो रहे हैं।


मासूमों की जान जोखिम में, जिम्मेदार मौन
​अधिकारी के इस बयान से साफ है कि मैदानी स्तर पर औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की फाइलों में यह मांग दबी हुई है। इन केंद्रों में आने वाले नन्हे-मुन्ने बच्चों के सिर पर हमेशा किसी बड़े हादसे का डर मंडराता रहता है। गांव की प्रारंभिक शिक्षा और पोषण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माने जाने वाले इन केंद्रों के प्रति न तो जिला प्रशासन गंभीर दिख रहा है और न ही विभाग के आला अधिकारी।
​बड़ा सवाल यह है कि आखिर शासन-प्रशासन किस बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या सुशासन का मतलब सिर्फ कागजी औपचारिकताएं पूरी करना है, या धरातल पर मासूमों को एक सुरक्षित छत मुहैया कराना भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल है?


अनूप वर्मा, चारामा (जनधारा न्यूज़)

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