सारी अपीलें बेअसर: धड़ल्ले से जलाई जा रही पराली, मूकदर्शक बना प्रशासन

अनूप वर्मा (चारामा)
​चारामा। क्षेत्र में धान की फसल की कटाई पूरी होने के बाद किसानों द्वारा खेतों में पराली (नरवाई) जलाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। शासन-प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा लगातार पराली न जलाने की अपील की जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कोई असर दिखाई नहीं दे रहा है। किसान बेखौफ होकर खेतों में आग लगा रहे हैं, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ आम जनता की सेहत पर भी संकट मंडराने लगा है।
​प्रशासन की समझाइश हवा में उड़ी
​कृषि विभाग और स्थानीय प्रशासन द्वारा लगातार किसानों से आग्रह किया जा रहा है कि वे पराली को जलाने के बजाय उसका उपयोग जैविक खाद बनाने या गौठानों में गायों के चारे (पैरा दान) के रूप में करें। इसके बावजूद, अधिकांश किसान मनमानी पर उतारू हैं। रात के अंधेरे में खेतों में लगाई जा रही आग की तस्वीरें (जैसा कि संलग्न चित्र 1842517.jpg में साफ देखा जा सकता है) प्रशासन के दावों की पोल खोल रही हैं।


​घरों में घुस रही काली राख, लोग परेशान
​खेतों में बड़े पैमाने पर पराली जलाए जाने के कारण हवा में भारी मात्रा में चिपचिपी काली राख और कार्बन के कण तैर रहे हैं। हवा के साथ उड़कर यह कालापन लोगों के घरों के भीतर, आंगनों और कमरों के अंदर तक पहुंच रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सुबह उठते ही घरों के फर्श, बर्तनों और कपड़ों पर कालेपन की एक साफ परत दिखाई देती है, जिससे लोग बेहद परेशान हैं और गृहणियों को साफ-सफाई करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
​सेहत पर भारी पड़ रहा धुंआ
​पराली के धुएं के कारण पूरे क्षेत्र की आबोहवा जहरीली हो चुकी है। इस धुएं और हवा में मौजूद बारीक कणों की वजह से स्थानीय लोगों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है:
​आंखों में जलन: हवा में फैले इस कालेपन और धुएं के कारण राहगीरों और ग्रामीणों की आंखों में लगातार जलन और पानी आने की शिकायत हो रही है।
​सांस की बीमारियां: दमा (अस्थमा) और एलर्जी से पीड़ित मरीजों की तकलीफ दोगुनी हो गई है। सामान्य लोगों को भी सांस लेने में भारीपन और गले में खराश महसूस हो रही है।
​जमीन हो रही बंजर, कार्रवाई नहीं होने से बढ़े हौसले
​कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पराली जलाने से खेत की ऊपरी सतह पर मौजूद मित्र कीट और जरूरी पोषक तत्व पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खत्म हो रही है। इतनी बड़ी लापरवाही और एनजीटी के नियमों की धज्जियां उड़ने के बाद भी जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अब तक कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई या जुर्माना नहीं लगाया गया है। प्रशासन की इसी सुस्ती के कारण पराली जलाने वाले किसानों के हौसले बुलंद हैं।
​ग्रामीणों की मांग: क्षेत्र के नागरिकों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि केवल कागजी अपील करने के बजाय, खेतों का दौरा कर पराली जलाने वाले लोगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि इस प्रदूषण और परेशानी से राहत मिल सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *