कहानी – आंतरिक त्याग

अर्चना संजीव भटोरे

आज उनकी शादी को बीस साल पूरे हो गए थे। सुबह से मोबाइल पर शुभकामनाओं की झड़ी लगी थी—“सदा साथ रहें”, “यूँ ही मुस्कुराते रहें।”

रमा हर संदेश पर “धन्यवाद” लिखती रही।

घर में सब सामान्य था। रसोई में चाय बन रही थी, अख़बार की सरसराहट थी, पर दोनों के बीच वर्षों से फैली चुप्पी आज भी वैसी ही थी।

शादी के शुरुआती दिनों में रमेश का स्नेह रमा को प्रेम लगा था। धीरे-धीरे उसने समझा—वह स्नेह परिस्थितियों पर टिका था। जब तक बात उसके मन की होती, वह कोमल रहता; विरोध होते ही स्वर कठोर हो जाता। बात-बात पर तिरस्कार, “नहीं रहना हो तो चली जाओ”—यह वाक्य जैसे घर की दीवारों में दर्ज हो चुका था।

रमा कहीं नहीं गई।

उसने घर नहीं छोड़ा, रिश्ते नहीं छोड़े। बस एक दिन चुपचाप अपेक्षाएँ छोड़ दीं। उसने तय कर लिया—अब वह सम्मान माँगेगी नहीं, और अपमान पर टूटेगी नहीं। उसने पति को जीवन से नहीं, मन से मुक्त कर दिया।

वह साथ रहती रही, जिम्मेदारियाँ निभाती रही, मुस्कुराती रही।

पर भीतर से उसने रमेश को पति के स्थान से हटा दिया था।

शाम को रमेश ने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “विवाह वर्षगाँठ मुबारक।”

रमा ने सहज मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “आपको भी।”

उस क्षण उसे पहली बार लगा—त्याग हमेशा बाहर से दिखाई नहीं देता।

कभी-कभी सबसे बड़ा त्याग वही होता है, जब हम किसी को अपने मन से विदा कर देते हैं… और संसार को खबर भी नहीं होती।

खरगोन जिला पश्चिम निमाड़ मप्र

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