डॉ. सुनीता की कविता

मैं पिता के प्रेम में थी

और पिता हँसुली, बांकी और फावड़े के प्रेम में थे

मुझे इन निर्जीवों से वितृष्णा हुई

आँखों में मोटे- मोटे आँसू भर

दूर छिटककर नीम के मंडवे तले बैठ

टुकुर- टुकुर देखती रही

पिता उन्हें सहलाते- सहलाते ईमली के पास पहुँचे

और धीरे से बैठ गए

बसंत ने,

पत्तियों से पहले ही सेज सजा रखा था

चुरूर- मुरूर करते बिस्तर पर

पगड़ी खोल अँगोछा बिछाकर पिता लेट गये

झूमते इमली ने पंखा झला तो बबुल डाह से भर गया

अपनी औक़ात से अधिक झकोरा

उसके झरबेर से दूब दुःखी हुए

पखावज बजाते बादल दुगुनी धुन में झूमे

तपते सूरज ने देखा कि खिझलाया बबुल अपनी कँटीली झाड़ी

पिता के सिरहाने गिरा दिया

थके पिता गहरी नींद में थे

नींद में नाक मृदंग से बज रहे थे कि पिता की बाँहें खुली

और बाँहें काँटों पर औंधे लेट गईं

मुझे चिढ़ाते काँटें मुस्कुरा कर मेरी ओर देखने लगे

मेरी पनियल आँखें आग उगलती बबुल की ओर लपकीं

पैर काँटों से विधे तो पानी- पानी हुई आँखें

आकाश देखतीं देर तक मौन रहीं

कोई राह नहीं सूझा कि ईमली- बबुल के मध्य रूस- यूक्रेन की लड़ाई देर से देखता नीम

आगे बढ़ आया

नीम की पत्तियाँ धीरे-धीरे नीचे गिरीं

धरती पीली- हरी कॉलीन में बदलने लगी

काली- कलूटी बड़ी चिड़िया मेरे कंधे पर बैठ फुसफुसाई-

सुन न…

तेरे पिता प्रेम में हैं

धरती, आकाश, बादल, वृक्ष और जीवों के

तुझे निर्जीव से चिढ़ है?

चल तुझे उनमें जीव दिखाती हूँ

हवा के कंधे पर बैठे बांकी ने धीरे से इमली को छुआ

इमली की फल्लियां नीचे बिखर बुक्काफाड़ रो पड़ीं

बबुल आँसू पोछता

मुझे घूरता रहा जबकि

हँसुली, बाँकी, फरूहाआ मेरे गदोरियों से लिपट

संगीत छेड़ दिये

बादल बसंती धुन गाते

टापुर- टुपरू बरस पड़े

प्रेम में पड़े पिता की नींद टूट गई

धरती का सीना बनियान की छेद सरीखे फटे और

पेड़ों, फलों, फसलों व फूलों की डालियाँ

 कजरारे नेत्रों से झूम- झूम कजरी गाने लगीं

घृणा का रंग

क्षण में रंग- रंगीला हो गया

कथा दृश्यों से अनजान पिता ने

मुझे कंधे पर बिठाया और घर की ओर चल दिए

हथिनी हाँफने लगी

जबकि लाल पहाड़ी लज्जा से तनिक अधिक लाल हो गई

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