परीक्षा, हुनर और भविष्य- क्या बोर्ड एग्जाम है अंतिम सत्य है?


-सुभाष मिश्र

फरवरी-मार्च का महीना आते ही देश का माहौल बदल जाता है। होली की आहट, मौसम का बदलाव और इसके साथ ही बोर्ड परीक्षाओं की शुरुआत। लाखों विद्यार्थी परीक्षा कक्षों में बैठते हैं और करोड़ों अभिभावकों की धड़कनें उनके साथ चलती हैं। इस वर्ष भी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं-12वीं की परीक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं, जिनमें 43 लाख से अधिक छात्र शामिल हैं। राज्य स्तर पर भी परीक्षा केंद्रों पर व्यापक तैयारियाँ हैं, सुरक्षा इंतज़ाम हैं, प्रशासनिक निर्देश हैं और राजनीतिक नेतृत्व की ओर से शुभकामनाएँ भी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने विद्यार्थियों को आत्मविश्वास के साथ परीक्षा देने का संदेश दिया है।
व्यवस्थाएँ हर साल बेहतर होती जा रही हैं, पर एक प्रश्न हर बार उतनी ही तीव्रता से लौटता है—क्या परीक्षा का यह मौसम बच्चों के लिए अवसर का मौसम है या तनाव का?
नई शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया कि शिक्षा को कौशल और रोजगार से जोड़ा जाएगा। रटने की संस्कृति से आगे बढ़कर समझ, विश्लेषण और व्यावहारिक दक्षता को महत्व दिया जाएगा। स्कूल स्तर से ही व्यावसायिक शिक्षा, इंटर्नशिप और कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की बात की गई। परंतु व्यवहार में आज भी बोर्ड परीक्षा को जीवन का निर्णायक मोड़ मान लिया जाता है। दसवीं के बाद करियर तय नहीं होता, बारहवीं के बाद भी अलग-अलग प्रवेश परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं, फिर भी बोर्ड के प्रतिशत को सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना बना दिया गया है।
यही वह बिंदु है जहां हमारी नीतियां और हमारी मानसिकता एक-दूसरे से अलग खड़ी दिखाई देती हैं। हम हुनर की बात करते हैं, रोजगार की बात करते हैं, लेकिन परिवारों के भीतर आज भी टॉप करना ही सफलता का पर्याय बना हुआ है। हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा मेरिट सूची में आए। पर यह संभव नहीं कि सभी बच्चे अव्वल हों। जब सफलता को केवल शीर्ष रैंक से जोड़ा जाएगा, तो बाकी बच्चों के आत्मविश्वास पर अनावश्यक आघात होगा।
दुनिया के कई देशों में शिक्षा की संरचना अलग दृष्टिकोण अपनाती है। उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया में विद्यालय स्तर से ही बच्चों की रुचि और कौशल की पहचान पर जोर दिया जाता है। दसवीं के बाद बड़ी संख्या में छात्र व्यावसायिक प्रशिक्षण या तकनीकी पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ते हैं। वहां मानव श्रम को सम्मान प्राप्त है और कौशल आधारित रोजगार की स्पष्ट राह है। हर छात्र को एक ही सांचे में ढालने की कोशिश नहीं की जाती।
भारत में भी आईटीआई और कौशल विकास संस्थानों का ढांचा मौजूद है, पर सामाजिक धारणा अब भी उन्हें मुख्यधारा से अलग मानती है। जब तक हम एक कुशल तकनीशियन, कारीगर या तकनीकी विशेषज्ञ को उतना ही सम्मान नहीं देंगे जितना पारंपरिक पेशों को देते हैं, तब तक बोर्ड परीक्षा का दबाव बना रहेगा। प्रतिस्पर्धा की इस संस्कृति का एक कठोर चेहरा भी सामने आता है। कोटा जैसे शिक्षा केंद्रों से हर वर्ष आत्महत्या की खबरें आना केवल व्यक्तिगत विफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक दबाव का परिणाम है जहां असफलता को स्वीकार करने की गुंजाइश कम होती जा रही है। परीक्षा का डर कई बार परिणाम के डर से अधिक नहीं होता; असली भय समाज की अपेक्षाओं का होता है।
ऐसे में यह आवश्यक है कि बोर्ड परीक्षाओं को अधिक व्यावहारिक और बहुआयामी बनाया जाए। केवल तीन घंटे की लिखित परीक्षा पर निर्भरता कम हो। प्रोजेक्ट कार्य, प्रैक्टिकल, प्रस्तुति, आंतरिक मूल्यांकन और कौशल आधारित आकलन का अनुपात बढ़ाया जाए। विद्यालयों को स्थानीय उद्योगों और संस्थानों से जोड़ा जाए ताकि बच्चों को वास्तविक कार्यानुभव मिल सके। करियर परामर्श को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि हर छात्र अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप दिशा चुन सके। आईटीआई और कौशल संस्थानों को आधुनिक संसाधनों और उद्योग से प्रत्यक्ष जुड़ाव के साथ सशक्त किया जाए।
सबसे बड़ा परिवर्तन मानसिकता में होना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बोर्ड परीक्षा किसी बच्चे का संपूर्ण मूल्यांकन नहीं है। वह केवल एक शैक्षणिक पड़ाव है, अंतिम निर्णय नहीं। सफलता केवल अंकों से नहीं, बल्कि प्रयास, कौशल, समझ और चरित्र से भी मापी जाती है। जब तक समाज अंकों को ही अंतिम सत्य मानता रहेगा, परीक्षा का यह मौसम तनाव का मौसम बना रहेगा। लेकिन यदि हम शिक्षा को सचमुच हुनर, रोजगार और जीवन कौशल से जोड़ दें, यदि अभिभावक अपेक्षा की जगह सहयोग को प्राथमिकता दें और यदि नीति का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर प्रभावी हो, तो यही परीक्षा का समय बच्चों के आत्मविश्वास और संभावनाओं का उत्सव बन सकता है।
परीक्षा चल रही है। बच्चे उत्तर पुस्तिका भर रहे हैं। पर असली परीक्षा हमारी भी है—क्या हम उन्हें केवल नंबर की दौड़ में धकेलेंगे, या उनके भीतर छिपे हुनर को पहचानकर एक संतुलित, सम्मानजनक और व्यावहारिक शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करेंगे? भविष्य का निर्णय बोर्ड नहीं, हमारी सोच करेगी।

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