-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ की लोक-सांस्कृतिक स्मृति में हबीब तनवीर का नाटक ‘चरणदास चोर आज भी जीवित है। वह चोर, जो चोरी करता है, लेकिन सत्य और नैतिकता के लिए अपनी जान तक दे देता है। भारतीय परंपरा में चोरी को कभी-कभी विवशता, गऱीबी और ज़रूरत से जोड़ा गया है, जहां चोर की कोशिश होती है कि किसी की जान जाए, न ही सार्वजनिक जीवन बाधित हो।
लेकिन आज की चोरी उस नैतिक कल्पना को पूरी तरह ध्वस्त कर चुकी है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जि़ले में जो घटित हुआ, वह केवल चोरी नहीं, बल्कि हज़ारों लोगों की जान को जोखिम में डालने वाला संगठित अपराध है। यहां चोरों ने न सिफऱ् 40 साल पुराने लोहे के पुल को गैस कटर से काटकर उड़ा लिया, बल्कि इसके बाद रेलवे की नई पटरियों, फिशप्लेट और भारी मशीनरी तक को निशाना बना लिया। यह अपराध लालच की उस चरम अवस्था को दर्शाता है, जहां मानव जीवन, सार्वजनिक संपत्ति और सामाजिक जि़म्मेदारी सब कुछ बेमानी हो गया है।
17 जनवरी 2026 की रात, कोरबा शहर के ढोढ़ीपारा इलाके में हसदेव बायीं तट नहर पर बना करीब 60-70 फीट लंबा लोहे का पुल रातों-रात गायब हो गया। यही पुल वार्ड नंबर 17 के लोगों के लिए चार दशक से आवागमन का एकमात्र साधन था। रात 11 बजे तक जिस पुल से लोग घर लौट रहे थे, सुबह वह केवल कटे हुए गर्डरों के निशान बनकर रह गया।
जांच में स्पष्ट हुआ कि पुल को योजनाबद्ध तरीके से गैस कटर से काटा गया। 25 से 30 टन वजनी इस पुल की स्क्रैप कीमत भले ही 15 लाख रुपये बताई जा रही हो, लेकिन इसका वास्तविक मूल्य उस भरोसे और सुरक्षा से जुड़ा था, जिस पर रोज़मर्रा का जीवन टिका था। यही नहीं, इसी दौरान नगर निगम की पेयजल पाइपलाइन के लोहे के सुरक्षा कवच भी चुरा लिए गए। यदि मुख्य पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होती तो कोरबा की ढाई लाख से अधिक आबादी गंभीर जल संकट में फंस सकती थी।
इस घटना से उबरने से पहले ही जि़ले में दूसरी चौंकाने वाली चोरी सामने आई। गेवरा-पेंड्रा नई रेल लाइन परियोजना के तहत बिछाई जा रही रेलवे पटरियाँ, फिशप्लेट और भारी रेल सामग्री काटकर चोरी कर ली गई। कुसमुंडा से जटगा-कुचेना के 60-65 किलोमीटर क्षेत्र में करीब दो करोड़ रुपये की सामग्री गायब पाई गई। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय अवसंरचना परियोजना पर सीधा हमला है।
सवाल यह नहीं है कि चोरी हुई, सवाल यह है कि इतनी भारी मात्रा में लोहा काटकर ले जाने का साहस किस संरक्षण में पनप रहा है? पुलिस का यह दावा कि जि़ले में स्क्रैप कारोबार बंद है, इन घटनाओं के सामने खोखला प्रतीत होता है। शहर में कबाड़ की दुकानें सक्रिय हैं, भारी वाहन रात में चलते है, गैस कटर का उपयोग होता है और फिर भी सब ‘अनदेखा रह जाता है।
यहां एक गहरी समानता उभरती है। जिस तरह निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री, मिलावट और लापरवाही के कारण पुल, इमारतें और सड़कें गिरती हैं और लोग मारे जाते हैं लेकिन उसे अक्सर दुर्घटना मान लिया जाता है। उसी तरह इस चोरी को भी यदि केवल कबाड़ चोरी समझ लिया गया, तो यह समाज के लिए घातक भूल होगी।
असल में यह संभावित सामूहिक हत्या का अपराध है। पुल टूट सकता था जब लोग उस पर चल रहे हों। रेल पटरी से ट्रेन गुजर सकती थी। पानी की पाइपलाइन फट सकती थी। यह अपराध बताता है कि समाज में लालच किस हद तक हावी हो चुका है। नैतिकता, भय और उत्तरदायित्व तीनों का क्षरण हो रहा है। यह केवल चोरों की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी कहानी है, जो समय रहते चेतावनी नहीं सुनती।
एसआईटी का गठन हुआ है, कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या यह मामला उदाहरण बनेगा या फिर कुछ समय बाद भूल जाएगा। यदि इसे साधारण चोरी मानकर निपटा दिया गया तो आने वाले समय में इसके दुष्परिणाम और भी भयावह होंगे। आज ज़रूरत है यह स्वीकार करने की कि यह अजब-गज़़ब चोरी नहीं, बल्कि समाज के बदलते चरित्र का भयावह संकेत है, जहां लोहे के साथ-साथ संवेदनाएँ भी काटकर ले जाई जा रही हैं।