प्राइवेट रॉकेट से लेकर मून मिशन तक, बदल रही भारत की तस्वीर।

भारत ने अंतरिक्ष की दौड़ में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। देश की पहली निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने अपना पहला ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च कर दिया है। यह कदम भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है। भारत की स्पेस इकॉनमी आज 8.4 अरब डॉलर की हो चुकी है। साल 2020 में निजी निवेश के लिए रास्ते खुलने के बाद से इस सेक्टर में 400 से ज्यादा नए स्टार्टअप जुड़ चुके हैं।

भारत का अंतरिक्ष विभाग अब डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन और मानव अंतरिक्ष उड़ान जैसे बड़े लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। साल 2014 में मंगल मिशन की सफलता के बाद से भारत का आत्मविश्वास काफी बढ़ा है। साल 2023 में चंद्रयान-3 की कामयाबी ने भारत को चंद्रमा पर यान उतारने वाला दुनिया का चौथा देश बना दिया। अब वैज्ञानिक 2027 में चंद्रयान-4 के जरिए चांद से मिट्टी के सैंपल लाने की तैयारी कर रहे हैं। साथ ही 2028 में शुक्र ग्रह पर भी भारत अपना मिशन भेजेगा।

अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र का गहरा संबंध

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और रक्षा क्षेत्र के बीच का दायरा लगातार कम होता जा रहा है। अंतरिक्ष में इस्तेमाल होने वाली तकनीक का उपयोग मिसाइल और मिलिट्री ड्रोन प्रोग्राम में भी हो रहा है। प्राइवेट कंपनियां न केवल रॉकेट बल्कि सैटेलाइट और गाइडेंस सिस्टम भी बना रही हैं। भारत का लक्ष्य है कि साल 2040 तक इसकी स्पेस इंडस्ट्री का आकार 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाए।

गगनयान मिशन पर टिकीं निगाहें

इसरो अब अपने सबसे महत्वाकांक्षी मिशन गगनयान की तैयारी में जुटा है। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2035 तक भारत का अपना स्पेस स्टेशन बनाने का लक्ष्य रखा है। वहीं 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्री चांद पर कदम रखेंगे। इन सभी मिशनों के साथ भारत दुनिया के विकसित देशों के बराबर खड़ा हो गया है।

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