पार्टियों में टूट : विपक्ष की कमजोरी या सत्ता की रणनीति!

-सुभाष मिश्र

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी बहुदलीय व्यवस्था रही है। अलग-अलग विचारधाराओं के अनेक दल भारतीय राजनीति में हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा राजनीतिक चलन तेजी से बढ़ा है, जिसने लोकतंत्र की अस्मिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह चलन है निर्वाचित विधायकों या सांसदों का अपने ही दल को छोड़ देना, नई शर्तों पर नए राजनीतिक दलों में सदस्यता लेना, दलों का टूटकर नए राजनीतिक दल बनाना ये सारी बातें इतनी आम हो गई हैं कि आम जनता को आश्चर्य होता है कि नेताओं में कोई अपने दल या लोकतंत्र के प्रति या जनता के प्रति कोई आदर, जवाबदेही या आस्था बची है या नहीं? क्या भारतीय राजनीति से वैचारिक प्रतिबद्धता खत्म होती जा रही है? क्या जनता जिस दल के नाम पर किसी नेता को चुनकर भेजती है, उसके प्रति उस प्रतिनिधि की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं रह गई है? क्या राजनीति से नैतिकता बिल्कुल खत्म हो रही है? लोगों का मानना है कि पहले के नेताओं में आंख की शर्म थी। जनता का डर या नैतिक दबाव था, लेकिन अब इनमें से कोई भी बात नेताओं में कथित रूप से लगभग नहीं बची है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि यह सब सत्ता की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए संसद और विधानसभाओं का संख्या-गणित बदला जा रहा है। राजनीति में यह बातें हमेशा से होती रही है, लेकिन इधर के दो-तीन दशक में जिस तेजी से यह प्रवृत्ति बढ़ी है। उसमें सत्ता की रणनीति कम और में दल बदलने वाले नेताओं के लोभ लालच ज्यादा नजर आ रहे हैं।
एक समय था जब दल-बदल भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बुराई मानी जाती थी। विधायकों और सांसदों के लगातार पाला बदलने से सरकारें गिरती थीं और राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती थी। इसी कारण संविधान में दल-बदल विरोधी कानून लाया गया, ताकि जनता के जनादेश का सम्मान बना रहे। लेकिन राजनीति ने कानून से बचने के रास्ते भी खोज लिए। अब व्यक्तिगत दल-बदल कम और सामूहिक दलबदल ज्यादा दिखाई देती है। पार्टी का बड़ा हिस्सा अलग होकर खुद को असली संगठन घोषित करता है, चुनाव चिन्ह पर दावा करता है और अंतत: सत्ता के समीकरण बदल जाते हैं। कानून की पतली गलियों से रास्ता निकाल कर नियम कानून तोड़े जाते हैं ।
पिछले कुछ वर्षों की राजनीति पर नजर डालें तो महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन, उसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में टूट, विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के विधायकों और सांसदों का अलग होना, आम आदमी पार्टी के विधायक को सांसदों का दलबदल और अब तृणमूल कांग्रेस सहित कई क्षेत्रीय दलों में असंतोष और दलबदल सिर्फ आत्मा की आवाज या आदर्श के कारण दल बदल नहीं है। यह केवल संयोग नहीं माना जा सकता है। हर घटना का अपना स्थानीय कारण हो सकता है, लेकिन जब ऐसी घटनाएं लगातार होने लगें तो उनके व्यापक राजनीतिक अर्थ भी सामने आने लगते हैं। नेताओं पर से आमजन का भरोसा टूटने लगता है। मौजूदा लोकसभा के दौरान संसद में दो महत्वपूर्ण राजनीतिक संकल्प सामने आए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इसी लोकसभा में जातीय जनगणना का रास्ता खुलेगा। लंबे राजनीतिक दबाव के बाद केंद्र सरकार ने जातीय जनगणना की घोषणा की। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण कानून को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। इन दोनों मुद्दों ने संसद के संख्या-गणित को पहले से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
यहीं से यह बहस शुरू होती है कि क्या सत्ता पक्ष भविष्य में आवश्यक संवैधानिक संशोधनों और बड़े राजनीतिक निर्णयों को ध्यान में रखकर अपनी संसदीय ताकत बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि विपक्षी दलों में लगातार टूट होती है या उनके सांसद किसी न किसी रूप में सत्ता पक्ष के साथ खड़े होते हैं, तो इससे सरकार की स्थिति मजबूत होती है। यह किसी भी राजनीतिक दल की स्वाभाविक रणनीति हो सकती है ।
भाजपा पर विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि वह विपक्षी दलों को कमजोर करने की राजनीति कर रही है। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि यदि किसी दल के नेता अपने नेतृत्व से असंतुष्ट होकर अलग होते हैं तो उसके लिए सत्ता पक्ष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोनों पक्षों के अपने-अपने राजनीतिक तर्क हैं, लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रश्न सत्ता और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप से आगे जाकर जनता का है।
जनता ने जिस उम्मीदवार को चुना था, क्या उसने व्यक्ति को चुना था या उस राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा को? यदि कोई नेता चुनाव किसी दल के चुनाव चिन्ह पर जीतता है और कुछ समय बाद पूरी तरह विपरीत राजनीतिक खेमे में पहुंच जाता है, तो क्या यह मतदाताओं के विश्वास के साथ धोखा है? लोकतंत्र केवल कानूनी व्यवस्था का नाम नहीं है। वह नैतिक जिम्मेदारी के लिए भी कानून होना चाहिए। जनादेश का सम्मान केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे कार्यकाल तक बना रहना चाहिए। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के लिए केवल सत्ता पक्ष को दोष देना भी उचित नहीं होगा। यदि किसी विपक्षी दल में लगातार टूट हो रही है, उसके सांसद और विधायक असंतुष्ट होकर दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं तो विपक्ष को भी सोचना होगा। क्या उसके संगठन में कोई कमी है? क्या नेतृत्व पर विश्वास कमजोर हुआ है? क्या दलों के भीतर बातचीत या विश्वास की कमी हो रही है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोजे जाएंगे तो केवल सत्ता पक्ष की रणनीति को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं होगा।
लोकतंत्र में मजबूत सरकार जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक मजबूत विपक्ष भी है। सत्ता को जवाबदेह बनाए रखने, नीतियों की समीक्षा करने और जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए एक सशक्त विपक्ष अनिवार्य है। यदि विपक्ष लगातार कमजोर होता गया और क्षेत्रीय दल टूटते गए, तो लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कम जाएगी। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा नेता किस दल में गया। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में जनता के वोट और चयन की इज्जत उसका अपना चुना हुआ उम्मीदवार ही नहीं करता है? क्या दल-बदल विरोधी कानून अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रहा है?  
इन सवालों के उत्तर आने वाले वर्षों की राजनीति तय करेगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज दलों में हो रही टूट या दलबदल आने वाले समय में राजनीति में बड़ी उथल-पुथल लाएगी। यदि राजनीतिक दल या उम्मीदवार जनता के विश्वास के सम्मान, वैचारिक प्रतिबद्धता की उपेक्षा करेंगे तो जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर होगा। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, वह विश्वास से चलता है। आगामी समय में जनता के सामने सबसे महत्वपूर्ण यह सवाल होगा कि वह किस उम्मीदवार पर भरोसा करें?

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