नया शिक्षा सत्र : नामांकन से सीखने तक, क्या बदलेगी भारतीय शिक्षा की तस्वीर?

-सुभाष मिश्र

देश के अधिकांश राज्यों में ग्रीष्मकालीन अवकाश समाप्त होने के साथ ही नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हो रहा है। कहीं 1 जून से तो कहीं 16 जून और कुछ राज्यों में जुलाई से विद्यालयों की घंटियां फिर से गूंजने लगेंगी। नई किताबों की खुशबू, नए बस्ते, नई यूनिफॉर्म और नए सपनों के साथ लाखों बच्चे विद्यालयों की ओर लौटेंगे। सरकारें भी शाला प्रवेश उत्सव, स्कूल चलें हम अभियान और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। लेकिन हर नए शिक्षा सत्र की तरह इस बार भी कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़े हैं। क्या शत-प्रतिशत शिक्षा का लक्ष्य हासिल हो सकेगा? क्या सरकारी और निजी स्कूलों के बीच की खाई कम होगी? क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बदलाव जमीन पर दिखाई देंगे? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या बच्चे विद्यालयों के साथ वास्तविक जुड़ाव महसूस करेंगे?
भारत की शिक्षा यात्रा को यदि आजादी के समय से देखा जाए तो यह एक उल्लेखनीय परिवर्तन की कहानी है। 1951 में देश की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी, जो आज 75 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। करोड़ों बच्चे विद्यालयों तक पहुंचे हैं। प्राथमिक शिक्षा लगभग सार्वभौमिक हो चुकी है और शिक्षा का अधिकार कानून ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया है।
सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, साक्षर भारत मिशन और समग्र शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं ने शिक्षा के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी क्रम में नया शिक्षा सत्र केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि शिक्षा के व्यापक सामाजिक अभियान का हिस्सा है। विद्यालय खुलते ही शाला प्रवेश उत्सव आयोजित किए जाते हैं। पंचायत प्रतिनिधि, शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, स्कूल प्रबंधन समितियां और अभिभावक मिलकर बच्चों को विद्यालय तक लाने का प्रयास करते हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों से प्राप्त बच्चों की सूची के आधार पर पहली कक्षा में प्रवेश सुनिश्चित किया जाता है। पांचवीं से छठी और आठवीं से नौवीं कक्षा में जाने वाले विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि वे बीच में पढ़ाई न छोड़ें।
सरकार की ओर से विद्यार्थियों को नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकें, गणवेश, छात्रवृत्ति, मध्यान्ह भोजन, साइकिल और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए विशेष योजनाएं संचालित हैं। इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती अब नामांकन नहीं बल्कि सीखने की गुणवत्ता और विद्यालय में निरंतर उपस्थिति है।
यद्यपि ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय कमी आई है, लेकिन समस्या अभी समाप्त नहीं हुई है। प्राथमिक स्तर पर स्थिति काफी बेहतर हुई है, किंतु माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक कारणों से अनेक विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक परिवार ऐसे हैं जहां शिक्षा को रोजगार से जोड़कर नहीं देखा जाता। बाल श्रम, घरेलू जिम्मेदारियां और सामाजिक परिस्थितियां बच्चों को विद्यालय से दूर कर देती हैं। यही कारण है कि सरकार इस बार भी ड्रॉपआउट विद्यार्थियों को वापस मुख्यधारा में लाने पर विशेष जोर दे रही है। इस शिक्षा सत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का क्रमिक प्रभाव होगा। यह नीति केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन नहीं बल्कि शिक्षा की सोच बदलने का प्रयास है। लंबे समय तक भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर यह आरोप लगता रहा कि वह परीक्षा और अंकों तक सीमित होकर रह गई है। विद्यार्थी डिग्री तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन रोजगार और कौशल के क्षेत्र में पीछे रह जाते हैं। नई शिक्षा नीति इसी अंतर को समाप्त करने का प्रयास करती है।
नीति के तहत कक्षा 6 से ही कौशल आधारित शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और इंटर्नशिप की अवधारणा को बढ़ावा दिया जा रहा है। विद्यार्थियों को केवल गणित, विज्ञान और भाषा तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि उन्हें कृषि, तकनीक, उद्यमिता, हस्तशिल्प, कोडिंग और स्थानीय व्यवसायों से भी जोड़ा जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसा युवा तैयार करना है जो केवल नौकरी खोजने वाला न होकर अवसरों का सृजन करने वाला भी बने।
इस नए सत्र में विद्यालयों में गतिविधि आधारित शिक्षा, डिजिटल संसाधनों का उपयोग, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर विशेष ध्यान तथा सीखने के परिणामों का मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य केवल बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उन्हें वास्तविक अर्थों में सीखने योग्य बनाना है। हालांकि शिक्षा व्यवस्था की चर्चा निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच के अंतर के बिना अधूरी रहेगी। आज भी बड़ी संख्या में अभिभावक निजी विद्यालयों को बेहतर विकल्प मानते हैं। इसका कारण केवल अंग्रेजी माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, संसाधन, तकनीकी सुविधाएं और बेहतर परिणामों की धारणा भी है। दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों में बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी पढ़ते हैं जिनके लिए शिक्षा सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम है। यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में अनेक सरकारी विद्यालयों ने उल्लेेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। कई राज्यों में उत्कृष्ट सरकारी विद्यालय मॉडल विकसित किए गए हैं। डिजिटल कक्षाएं, स्मार्ट बोर्ड, विज्ञान प्रयोगशालाएं और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ी है। अनेक सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर रहे हैं। फिर भी संसाधनों, शिक्षक उपलब्धता और सीखने के वातावरण के मामले में सरकारी और निजी विद्यालयों के बीच अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
निजी विद्यालयों का भी अपना पक्ष है। उनका तर्क है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक अधोसंरचना, डिजिटल संसाधन और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि वे अधिक शुल्क लेते हैं। दूसरी ओर अभिभावकों की चिंता यह है कि शिक्षा धीरे-धीरे महंगी होती जा रही है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कई परिवारों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। आने वाले वर्षों में शिक्षा नीति की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वह सरकारी और निजी शिक्षा के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित करती है।
जहां तक शत-प्रतिशत शिक्षा के लक्ष्य का प्रश्न है, यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी अवश्य है लेकिन असंभव नहीं। भारत ने पिछले सात दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रगति की है, वह इस दिशा में आशा जगाती है। फिर भी केवल विद्यालय में नामांकन को सफलता नहीं माना जा सकता। वास्तविक सफलता तब होगी जब प्रत्येक बच्चा विद्यालय में नियमित रूप से उपस्थित रहे, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे, बुनियादी कौशल विकसित करे और जीवन में आगे बढऩे के अवसर हासिल करें। नया शिक्षा सत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस पीढ़ी को तैयार कर रहा है जो भारत के अगले 25 वर्षों की दिशा तय करेगी।
यदि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्य सही अर्थों में लागू होते हैं, यदि सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में निरंतर सुधार होता है, यदि ड्रॉपआउट बच्चों को मुख्यधारा में वापस लाने के प्रयास सफल होते हैं और यदि शिक्षा को रोजगार, कौशल तथा नवाचार से जोड़ा जाता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय शिक्षा व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश कर सकती है।
विद्यालयों की घंटियां फिर बजेंगी, बच्चे फिर कक्षाओं में लौटेंगे, शिक्षक फिर नए सपनों को आकार देंगे। लेकिन इस नए सत्र की सफलता केवल प्रवेश संख्या से नहीं मापी जाएगी। इसका मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि कितने बच्चे सीख पाए, कितने बच्चे जुड़े रहे, कितने बच्चे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े और कितने बच्चों के जीवन में शिक्षा वास्तव में परिवर्तन का माध्यम बन सकी।

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