कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। छत्तीसगढ़ में किसानों के लिए टोकन व्यवस्था अब केवल धान खरीदी तक सीमित नहीं रहने वाली है। राज्य सरकार खरीफ सीजन 2026 में रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया के वितरण को टोकन प्रणाली से नियंत्रित करने की तैयारी कर रही है। सरकार का तर्क है कि इससे जमाखोरी, कालाबाजारी और जरूरत से अधिक खरीद पर रोक लगेगी, लेकिन दूसरी ओर किसानों के बीच इस बात को लेकर चिंता भी बढ़ रही है कि कहीं खाद प्राप्त करने की प्रक्रिया और अधिक जटिल न हो जाए।
प्रदेश में हर साल खरीफ सीजन शुरू होते ही उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। खेती-किसानी की तैयारियों के बीच किसान समितियों और उर्वरक केंद्रों की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि कृषि विभाग खाद की उपलब्धता और वितरण को लेकर नई रणनीति पर काम कर रहा है। विभाग की योजना है कि किसानों को उनकी जोत और वास्तविक आवश्यकता के आधार पर निर्धारित मात्रा में ही यूरिया दिया जाए। इसके लिए टोकन आधारित वितरण प्रणाली लागू करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार इस व्यवस्था की शुरुआत प्रयोग के तौर पर गरियाबंद और बीजापुर जैसे जिलों से की जा सकती है। यदि वहां परिणाम संतोषजनक रहे तो इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। विभागीय अधिकारियों का दावा है कि इससे खाद वितरण अधिक पारदर्शी होगा और वास्तविक किसानों को समय पर उर्वरक मिल सकेगा। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि नई व्यवस्था कहीं किसानों के लिए अतिरिक्त औपचारिकताओं और इंतजार का कारण न बन जाए।
खाद की मांग में इस वर्ष उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन 2026 के लिए छत्तीसगढ़ को 15.55 लाख मीट्रिक टन उर्वरक आवंटित किया है, जिसमें यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीके और एसएसपी शामिल हैं। कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में वर्तमान समय में 9.29 लाख मीट्रिक टन से अधिक उर्वरक उपलब्ध है। इसके बावजूद मांग लगातार बढ़ रही है और अब तक 3.33 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद किसानों को वितरित की जा चुकी है।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष 30 मई तक जहां लगभग 3 लाख मीट्रिक टन खाद का उठाव हुआ था, वहीं इस वर्ष यह आंकड़ा बढ़कर करीब 3.34 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। यानी खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले ही खाद की मांग में तेजी देखी जा रही है। यही वजह है कि सरकार वितरण प्रणाली को नियंत्रित करने और संभावित संकट से बचने के लिए नए उपायों पर जोर दे रही है।
उधर खाद की बढ़ती मांग के साथ-साथ कालाबाजारी और अवैध भंडारण की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। कृषि विभाग ने विभिन्न जिलों में निरीक्षण अभियान तेज कर दिया है। कोरबा जिले में छह उर्वरक विक्रेताओं को नियमों के उल्लंघन पर नोटिस जारी किए गए हैं। पाली क्षेत्र में बड़ी मात्रा में खाद के भंडारण की शिकायत मिलने पर एक दुकान के विक्रय पर प्रतिबंध लगाया गया है। वहीं जांजगीर-चांपा जिले में निरीक्षण के दौरान 2638 बोरी रासायनिक उर्वरक जब्त कर एक प्रतिष्ठान को सील कर दिया गया।
इन कार्रवाइयों को सरकार अपनी सख्ती का प्रमाण बता रही है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध है तो फिर जमाखोरी और कालाबाजारी की नौबत क्यों आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल निगरानी और नियंत्रण से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि वितरण तंत्र को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाना भी जरूरी है।
सरकार की रणनीति केवल रासायनिक उर्वरकों के वितरण तक सीमित नहीं है। कृषि विभाग अब जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर भी जोर दे रहा है। विभाग का मानना है कि रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है और कृषि की दीर्घकालिक उत्पादकता पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसी सोच के तहत इस वर्ष लगभग 40 हजार एकड़ क्षेत्र में हरी खाद उगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
साथ ही किसानों को बायो-फर्टिलाइजर और जैविक उर्वरकों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग का लक्ष्य तीन लाख बोतल बायो-फर्टिलाइजर वितरित करने का है। पिछले वर्ष जहां हरी खाद का उपयोग केवल 10 हजार एकड़ क्षेत्र तक सीमित था, वहीं इस बार इसे चार गुना बढ़ाने की योजना बनाई गई है।
फिलहाल सरकार का दावा है कि टोकन प्रणाली, सघन निगरानी और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देने जैसे कदमों से किसानों को समय पर खाद उपलब्ध होगी और कृत्रिम संकट की स्थिति नहीं बनेगी। लेकिन खेतों में बोवनी की तैयारी कर रहे किसानों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई टोकन व्यवस्था वास्तव में सुविधा बढ़ाएगी या फिर धान खरीदी की तरह खाद के लिए भी लंबी प्रतीक्षा और नई परेशानियों का कारण बनेगी। खरीफ सीजन शुरू होने से पहले यही बहस अब गांव-गांव में चर्चा का विषय बन गई है।