0 रेल लाइन की सुविधा , जोंक परियोजना व जिला की मांग आज भी अधूरी व अनसुनी 0
0 क्षेत्र के चुने हुवे जनप्रतिनिधियों व क्षेत्रवासियों की उदासीनता व निष्क्रियता प्रमुख कारण 0
दिलीप गुप्ता
सरायपाली: किसी भी लोकसभा , विधानसभा , त्रिस्तरीय पंचायत हो या नगरीय निकाय इनके सर्वांगीण विकास , निर्माण , बुनियादी सुविधाओं के साथ साथ आम नागरिकों को सामाजिक , शिक्षा , स्वास्थ्य , परिवहन , जिला कार्यालय , सुगम यातायात व आवागमन की सुविधाएं भी उपलब्ध कराए जाने की जिम्मेदारी संबंधित चुने हुवे जनप्रतिनिधियों की होती है । इनके साथ साथ संबंधित क्षेत्रों के पार्टी कार्यकर्ताओं , स्थानीय जनप्रतिनिधियों व नागरिकों की भी सबसे अधिक जिम्मेदारी व जवाबदारी होती है कि वे अपने क्षेत्र के लिए उपरोक्त मांगो को जबरदस्त व दमदारी के साथ अपने चुने हुवे सांसद , विधायक ,नपाध्यक्ष , जनपद व जिला पंचायत अध्यक्ष व सरपंचों के समक्ष रखे । किंतु दुखद की माँगो को रखे जाने के बावजूद चुने हुवे जनप्रतिनिधियों द्वारा आम जनता की मांगों को वह सम्मान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए । जनप्रतिनिधियों , शासन व प्रशासन द्वारा गंभीरता से नहीं लिए जाने के कारण आम जनता में जहां आक्रोश बढ़ता है तो वहीं चुनावों में इसका असर भी दिखाई देता है ।
सरायपाली क्षेत्र की सबसे पुरानी व सर्वाधिक आवश्यकताओं के लिए 3 मांगो को आजादी के बाद से रखी जा रही है जिनमें जाेक परियोजना , रायपुर से बरगढ़ रेल लाइन व सरायपाली को जिला बनाए जाने की मांग प्रमुख है किंतु लगातार आवाज उठाये जाने के बावजूद इस पर कोई सकारात्मक परिणाम अभी तक सामने नहीं आया है ।
सरायपाली को जिला बनाए जाने की मांग विधायक चातुरी नंद द्वारा मुख्यमंत्री से की 6 माह पूर्व की गई थी सर्वे की घोषणा के बाद इस पर क्या कार्यवाही की गई इसकी कोई जानकारी नहीं है । इसी तरह वर्षों पुरानी रेल लाइन की मांग रायपुर बरगद रेल लाइन निर्माण संघर्ष समिति सरायपाली द्वारा विगत 5-6 वर्षों से की जा रही है । सांसद श्रीमती रूपकुमारी चौधरी द्वारा भी रेलमंत्री से मांग किए जाने की जानकारी मिली है पर इसके आगे की कार्यवाही की कोई जानकारी नहीं मिली । वैसे इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भविष्य में सरायपाली क्षेत्रवासियों को न जिला और न ही रेल लाइन निर्माण की सुविधा मिलेगी । इसके पीछे सबसे कारण है कि जनप्रतिनिधियों व क्षेत्रवासियों की उदासीनता व निष्क्रियता अहम है ।
बात यहां दूरी की नहीं बल्कि सरकार , प्रशासनिक , जनप्रतिनिधियों व आमजनता की उपेक्षा व निष्क्रियता की है । जिसकी वजह से सरायपाली एक महत्वपूर्ण नगर होने के बावजूद उसे वह सुविधाएं नहीं मिल पाई जिसका वह हकदार है ।
छत्तीसगढ़ का सीमांत क्षेत्र सरायपाली आज भी विकास की मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। महासमुंद जिले का हिस्सा होने के बावजूद सरायपाली से जिला मुख्यालय महासमुंद की दूरी लगभग 130 किलोमीटर है। यह दूरी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा, विकास की असमानता और क्षेत्रीय असंतुलन की कहानी भी कहती है। प्रदेश में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहां अपने ही जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए लोगों को इतनी लंबी दूरी तय करनी पड़ती हो।
यदि आसपास के अन्य जिलों की दूरी देखी जाए तो सरायपाली का भौगोलिक और प्रशासनिक संबंध अन्य जिलों से कहीं अधिक नजदीक दिखाई देता है। ओडिशा का बरगढ़ 60 किलोमीटर, सारंगढ़ 40 किलोमीटर, रायगढ़ 90 किलोमीटर, शक्ति 100 किलोमीटर, जांजगीर-चांपा 85 किलोमीटर, बलौदा बाजार 110 किलोमीटर और बिलासपुर भी लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। वहीं संबलपुर की दूरी लगभग 110 किलोमीटर है। यह स्थिति अपने आप में यह प्रश्न खड़ा करती है कि आखिर सरायपाली को अब तक प्रशासनिक दृष्टि से उचित महत्व क्यों नहीं मिला।
सरायपाली को जिला बनाने की मांग कोई नई नहीं है। पिछले लगभग 30 वर्षों से क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और आम जनता लगातार सरायपाली को जिला बनाने की मांग कर रहे हैं। समय-समय पर आंदोलन हुए, ज्ञापन सौंपे गए, धरना प्रदर्शन किए गए, लेकिन आज तक यह मांग केवल आश्वासनों तक सीमित दिखाई देती है। लोगों का मानना है कि यदि सरायपाली को जिला बनाया जाता है तो प्रशासनिक कार्यों में तेजी आएगी, ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकेगा।
यह केवल प्रशासनिक दूरी का मामला नहीं है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की कमी भी यहां के लोगों की सबसे बड़ी समस्या है। रेलवे लाइन की मांग भी वर्षों से लगातार उठाई जा रही है। राजपत्र में रेल लाइन निर्माण की घोषणा होने के बाद लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब सरायपाली क्षेत्र भी रेल नेटवर्क से जुड़ जाएगा। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी यहां रेल सुविधा शुरू नहीं हो सकी। दूसरी ओर अबूझमाड़ जैसे अत्यंत दुर्गम और नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भी रेल सेवा प्रारंभ हो चुकी है। ऐसे में सरायपाली क्षेत्र के लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब सरायपाली को अबूझमाड़ से भी अधिक पिछड़ा माना जाने लगा है।
विडंबना यह भी है कि यह वही क्षेत्र है जहां से अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का विधानसभा क्षेत्र रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे स्व. विद्याचरण शुक्ल भी लंबे समय तक लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते रहे । स्थानीय महल के सिंह परिवार भी लंबे समय तक सरायपाली व बसना का प्रतिनिधित्व करते रहे पर किसी ने भी सरायपाली के विकास के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया ।राजनीतिक दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व रखने वाला यह क्षेत्र आज मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग और परिवहन जैसी सुविधाओं के अभाव में यहां के युवाओं को रोजगार के लिए अन्य शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बड़े शहरों का सहारा लेना पड़ता है।
सरायपाली क्षेत्र छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सीमा पर स्थित होने के कारण व्यापार और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां कृषि और व्यापार की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उचित अधोसंरचना के अभाव में क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पा रहा। यदि यहां रेलवे सुविधा और जिला मुख्यालय जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं तो यह क्षेत्र पूरे पूर्वी छत्तीसगढ़ के विकास का नया केंद्र बन सकता है।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि हर चुनाव में विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही सरायपाली की समस्याएं फिर से फाइलों में दब जाती हैं। वर्षों से जनता केवल आश्वासन सुनती आ रही है। यही कारण है कि अब लोगों में आक्रोश और निराशा दोनों दिखाई देने लगे हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और नीति निर्धारक जनप्रतिनिधियों को सरायपाली की भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, आर्थिक संभावनाओं और प्रशासनिक कठिनाइयों को गंभीरता से समझने व कुछ करने का समय आ गया है । केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि ठोस निर्णयों से ही इस क्षेत्र की दशा व दिशा बदली जा सकती है। सरायपाली को जिला बनाने और रेल सुविधा उपलब्ध कराने की मांग अब केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि क्षेत्र के लाखों लोगों के अधिकार और सम्मान का प्रश्न बन चुकी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरायपाली की इस दुर्दशा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या यह केवल प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम है, या फिर वर्षों से चली आ रही राजनीतिक उपेक्षा का? जवाब जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि यदि समय रहते इस क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो विकास की मुख्यधारा से सरायपाली की दूरी और भी बढ़ती चली जाएगी।