रायपुर। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर मचे घमासान के बीच अब सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। इस सियासी खींचतान में कूदते हुए भाजपा के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने एक बड़ा बयान दिया है। चंद्राकर ने कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव (बाबा) को सीधे तौर पर कांग्रेस छोड़ने की नसीहत दे डाली है। उन्होंने कहा कि बाबा साहब को अब यह तय करना होगा कि उन्हें कांग्रेस में लगातार अपमानित होना है या फिर राष्ट्र के विकास के साथ आगे बढ़ना है।
दरअसल, यह पूरा विवाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उस बयान के बाद और भड़क गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि “मैं टीएस सिंहदेव के बयान पर प्रतिक्रिया नहीं देता।” बघेल के इस रुख पर तंज कसते हुए अजय चंद्राकर ने कहा कि छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के बाद से ही कांग्रेस का एक सूत्रीय मिशन बन गया था कि बाबा साहब को किस तरह अपमानित किया जाए। उन्होंने कहा कि अपमान की भी एक पराकाष्ठा होती है। बाबा साहब एक गौरवशाली और ऐतिहासिक वंश से आते हैं, इसलिए उन्हें कांग्रेस के भीतर इस तरह का तिरस्कार सहने के बजाय पार्टी से अलग हो जाना चाहिए।
झीरम कांड की बरसी पर भूपेश बघेल और कवासी लखमा को घेरा
झीरम घाटी नक्सली हमले की 13वीं बरसी पर मीडिया से चर्चा करते हुए अजय चंद्राकर ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इस संवेदनशील और दुखद घटना को सिर्फ अपनी ‘राजनीतिक ऑक्सीजन’ और सहानुभूति बटोरने का जरिया बना रखा है। भाजपा नेता ने चुनौती देते हुए कहा:
“जिस दिन भूपेश बघेल अपनी जेब में रखे कथित सबूतों को सार्वजनिक कर देंगे और कवासी लखमा को सामने रखकर पूरे प्रदेश की जनता को उस दिन का घटनाक्रम बताएंगे, उस दिन सारी परतें खुद-ब-खुद खुल जाएंगी। कांग्रेस को यह भी साफ करना चाहिए कि घटना के बाद नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने अस्पताल में कवासी लखमा से क्या कहा था?”
पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के बयान पर भी किया पलटवार
इसके साथ ही चंद्राकर ने पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के उस बयान पर भी कड़ा पलटवार किया, जिसमें भगत ने खनिज संसाधनों में आदिवासियों को हिस्सेदारी देने की मांग की थी। भाजपा विधायक ने सवाल उठाया कि जब प्रदेश में 5 साल तक कांग्रेस की सरकार थी, तब अमरजीत भगत को आदिवासियों की याद क्यों नहीं आई? उन्होंने कैबिनेट या विधानसभा में इस मुद्दे को क्यों नहीं उठाया और क्या केंद्र सरकार को इस संबंध में कोई पत्र लिखा गया था? चंद्राकर ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता में रहते हुए इन नेताओं में सच बोलने का साहस नहीं होता, लेकिन कुर्सी जाते ही अपनी राजनीति चमकाने के लिए ये बड़े-बड़े बयान देने लगते हैं।