सरकारी दफ्तरों में ‘संलग्नीकरण’ का खेल, अफसरों ने रोके कर्मचारी

आदेश सरकार का, चलती अफसरों की संलग्नीकरण पर बढ़ा बवाल
वायरल ऑडियो के बाद खुली पोल, मूल विभागों से गायब कर्मचारी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी दफ्तरों में वर्षों से चल रहा “संलग्नीकरण” का खेल अब खुलकर विवाद का कारण बनता जा रहा है। सरकार भले ही समय-समय पर कर्मचारियों को उनके मूल विभागों में वापस भेजने के आदेश जारी करती रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई विभागों में अधिकारी अपनी सुविधा के मुताबिक कर्मचारियों को दूसरे कार्यालयों में रोके हुए हैं। सबसे ज्यादा शिकायतें वाहन चालकों और भृत्यों को लेकर सामने आ रही हैं, जिन्हें मूल पदस्थापना से हटाकर अफसरों के निजी या प्रशासनिक कामों में लगाया जा रहा है।
अब इस पूरे मामले ने नया मोड़ तब ले लिया, जब छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन ने इस पर सख्त रुख अपनाया। फेडरेशन के प्रांतीय संयोजक कमल वर्मा ने प्रदेशभर के जिला संयोजकों को पत्र जारी कर ऐसे कर्मचारियों की पूरी जानकारी मांगी है, जो अपने मूल विभाग को छोड़कर दूसरे कार्यालयों में काम कर रहे हैं। फेडरेशन का कहना है कि लगातार मिल रही शिकायतों से यह साफ हो गया है कि संलग्नीकरण अब अस्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि स्थायी सिस्टम का रूप ले चुका है।
फेडरेशन के मुताबिक, कई विभागों में स्थिति ऐसी है कि वाहन चालक और भृत्य वर्षों से दूसरे कार्यालयों में अटैच हैं। इससे न सिर्फ मूल विभागों का काम प्रभावित हो रहा है, बल्कि वेतन आहरण, उपस्थिति और प्रशासनिक नियंत्रण जैसी प्रक्रियाओं में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं। कई बार संबंधित विभाग के अधिकारी यह तक नहीं जानते कि उनके कर्मचारी वास्तव में कहां कार्यरत हैं।
इस मुद्दे को लेकर माहौल तब और गरमा गया, जब जांजगीर-चांपा जिले का एक ऑडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वायरल क्लिप में एक उच्च पदस्थ अधिकारी और वाहन चालक के बीच तीखी बातचीत सुनाई दे रही है। ऑडियो सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में खलबली मच गई है। कर्मचारी संगठनों के बीच भी इस मामले को लेकर नाराजगी बढ़ती दिखाई दे रही है। फेडरेशन ने माना है कि इस तरह के मामलों से संबद्ध संगठनों के बीच टकराव और अविश्वास की स्थिति पैदा हो रही है।
फेडरेशन का कहना है कि कई बड़े अधिकारियों के यहां एक से अधिक वाहन चालक और भृत्य कार्यरत हैं। हैरानी की बात यह है कि संबंधित अधिकारियों के तबादले के बाद भी इन कर्मचारियों को मूल विभाग में वापस नहीं भेजा जाता। यानी अधिकारी बदल जाते हैं, लेकिन संलग्नीकरण खत्म नहीं होता। यही वजह है कि कई विभागों में कर्मचारियों की कमी लगातार बढ़ रही है, जबकि दूसरी ओर कुछ कार्यालयों में जरूरत से ज्यादा स्टाफ तैनात है।
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि संलग्नीकरण की यह व्यवस्था अब “प्रभाव और पहुंच” का हिस्सा बन चुकी है। जिन कर्मचारियों की पकड़ मजबूत होती है, वे वर्षों तक सुविधाजनक कार्यालयों में बने रहते हैं, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थ कर्मचारियों पर काम का दबाव बढ़ता जाता है। इससे विभागीय संतुलन भी बिगड़ रहा है।
फेडरेशन ने सभी जिला संयोजकों से कहा है कि वे अपने-अपने जिलों में ऐसे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों, वाहन चालकों और भृत्यों की सूची जल्द उपलब्ध कराएं, जो दूसरे कार्यालयों में संलग्न होकर काम कर रहे हैं। इन आंकड़ों के आधार पर आगामी राज्य स्तरीय परामर्शदात्री बैठक में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाएगा। कर्मचारी संगठनों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं लगाया गया तो आने वाले दिनों में यह मामला और बड़ा प्रशासनिक विवाद बन सकता है।

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