स्क्रीन की निकटता दिल के कितने करीब ?

-सुभाष मिश्र

डिजिटल युग में रिश्तों का व्याकरण बदल गया है। भावनाओं की वर्तनी बदल गई है। आपसी रिश्तों की दुनिया ज्यादातर अंगूठे की नोक पर एक क्लिक पर टिकी हुई है। दुनिया में हर कहीं अब यह स्थिति है कि व्यक्ति और विशेषकर नई पीढ़ी अपनी सुबह सूरज की धूप से नहीं? स्मार्टफोन की नीली रोशनी से शुरू करते हैं। हम जिस दुनिया में सांस ले रहे हैं, वहां कनेक्टिविटी तो भरपूर है, लेकिन भीतरी जुड़ाव या प्रत्यक्ष जुड़ाव की भारी कमी महसूस होती है। ऑनलाइन डेटिंग, सोशल मीडिया और वर्चुअल चैटिंग प्लेटफॉर्म्स ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को एक ऐसे डिजिटल सांचे में ढाल दिया है, जहां लोग स्क्रीन पर तो करीब हैं, लेकिन असलियत में कोसों दूर।
डिजिटल क्रांति ने दरअसल सामाजिक मेलजोल के पुराने भूगोल को हिलाकर रख दिया है। पुराने समय में रिश्तों की नींव भौतिक या प्रत्यक्ष मेलजोल और मोहल्ले की शादियां, कार्यस्थल की मित्रता या पारिवारिक रूप में ही थी। लेकिन आज एल्गोरिदम तय करते हैं कि आपका हमसफर कौन होगा। अब भौगोलिक सीमाओं का अंत हो गया है। अब प्यार और दोस्ती के लिए पड़ोस में होना जरूरी नहीं। हजारों किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति आपके इनबॉक्स में मौजूद है।
अभिव्यक्ति की एक नई स्वतंत्रताआ गई है जिसने मध्यवर्ग का परम्परागत संकोच भी खत्म कर दिया है। जो बातें आंखों में आंखें डालकर कहने में जुबान लडख़ड़ाती थी, वे अब इमोजी और टेक्स्ट के जरिए आसानी से सेंड हो रही हैं। स्क्रीन एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है, जो झिझक को खत्म कर देती है। व्यक्ति सामने न हो तो यह स्क्रीन अतिरिक्त साहस भर देती है। अब यह झिझक और संकोच टूटने में पहले जैसा महीनों या बरसों का वक्त नहीं लगता है। स्त्री पुरुष के संबंधों में इस स्क्रीन ने एक बेहद चकित करने वाला काम किया है। पहले जमाने में व्यक्ति अपना प्रेम या लगाव बताने में महीनों लगा देता था। कभी-कभी बरसों और कभी-कभी अव्यक्त रह जाता था। अब यह स्थिति खत्म हो गई है। यह स्क्रीन व्यक्ति के भीतर साहस की ऊर्जा भर देती है। कल किसी से मिले और आज व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त कर देता है। और दिलचस्प और आश्चर्यजनक बात यह है कि प्रेम या मित्रता का प्रस्ताव अस्वीकार होने पर दुखी नहीं होता है। डिप्रेशन में नहीं जाता है। वह अगले विकल्प के बारे में सोचने लग जाता है। प्रेम में हताशा या डिप्रेशन के कुछ जो हादसे होते हैं, उनके अपने वर्गीय, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं। अन्यथा तो आज की पीढ़ी प्रेम मा रिश्तों को जेब में पड़ी चिल्लर की तरह खर्च करती है। और कपड़ों की तरह बदलने में देर भी नहीं करती है। वर्चुअल कनेक्शन ने निश्चित रूप से आधुनिक जीवन की कई मुश्किलों को हल भी किया है। इसे पूरी तरह नकारना तकनीकी प्रगति के प्रति थोड़ा अन्याय होगा।
महानगरों की भागदौड़ और एकाकी जीवन में डिजिटल कंपेनियनशिप एक सहारा बनकर उभरी है। जो लोग सामाजिक चिंता से जूझते हैं, उनके लिए चैटिंग प्लेटफॉर्म्स अपनी भावनाएं व्यक्त करने का सबसे सुरक्षित मंच हैं।
वीडियो कॉल और इंस्टेंट मैसेजिंग ने लंबी दूरी के रिश्तों में अहसास को जीवित रखा है। तकनीक ने उन दूरियों को पाट दिया है जो पहले रिश्तों के टूटने का कारण बनती थीं। पहले लंबी दूरियों के कारण लंबे समय तक मिलने-जुलने में दिक्कतें थीं। संवाद खत्म हो जाता था तो रिश्ते कमजोर हो जाते थे। लेकिन इस दिक्कत को, इन दूरियों को एक छोटे से स्क्रीन ने दूर कर दिया है।
आज कई ऐसे ऑनलाइन कम्युनिटीज और सपोर्ट ग्रुप्स हैं जहां लोग बिना अपनी पहचान उजागर किए अपने मानसिक तनाव को साझा कर सकते हैं।
लेकिन यह भी कड़वा सच है कि इन्सटेंट के चक्कर में नये रिश्तों की ठीक से पहचान नहीं हो पा रही है।
जहां एक ओर तकनीक ने दूर के लोगों को पास लाया, वहीं पास के लोगों के बीच एक अदृश्य दीवार भी खड़ी कर दी है। व्यक्ति घर में ही अजनबी है। यह एक कड़वी विडंबना है कि एक ही सोफे पर बैठे पति-पत्नी अपने-अपने फोन में खोए रहते हैं। ऑनलाइन उपस्थिति तो 24 घंटे है, लेकिन शारीरिक और मानसिक उपस्थिति नदारद है। रिश्तों का कमोडिटीकरण हो रहा है। डेटिंग एप्स ने रिश्तों को कैटलॉग शॉपिंग जैसा बना दिया है। एक स्वाइप से आप किसी को चुनते हैं और दूसरे से रिजेक्ट कर देते हैं। इस इन्सटेंट संस्कृति ने धैर्य और आपसी समझ की जगह ले ली है। और
एक डिजिटल एंग्जायटी या कहें डिजिटल चिंता पैदा हो गई हो। Seen, Typing… और Last Seen अब सिर्फ फीचर्स नहीं, बल्कि भावनाओं के नियंत्रक बन गए हैं। किसी का रिप्लाई न आना या सीन करके छोड़ देना आज के युवाओं में अवसाद और बेचैनी का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।
वर्चुअल अफेयर्स और वैवाहिक संकट भी पैदा हो रहा है। आधुनिक तकनीक ने मानवीय कमजोरियों को एक नया रास्ता दे दिया है। कई शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया की सुलभता ने वैवाहिक जीवन में डिजिटल दूरी पैदा की है। वर्चुअल अफेयर्स, जो अक्सर सिर्फ दोस्ती से शुरू होते हैं, वास्तविक रिश्तों की नींव हिलाने के लिए काफी साबित हो रहे हैं। स्क्रीन के पीछे की काल्पनिक दुनिया अक्सर वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों से ज्यादा आकर्षक लगने लगती है, जो अंतत: अलगाव या पृथक होने का कारण बनती है।
क्या तकनीक हमें अकेला कर रही है? यह एक बड़ा प्रश्न है। समाजशास्त्री अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि क्या तकनीक हमें जोड़ रही है या यह जुड़ाव का भ्रम है? सच तो यह है कि तकनीक माध्यम हो सकती है, मंजिल नहीं। हम हजारों फॉलोअर्स और फ्रेंड्स के बीच भी खुद को अकेला पाते हैं क्योंकि डिजिटल बातचीत में स्पर्श की गर्माहट, आंखों की नमी और साथ बैठने का मौन और सुख शामिल नहीं होता है। एक हग, इमोजी कभी भी असली गले मिलने का विकल्प नहीं बन सकती है।
डिजिटल डिटॉक्स और वास्तविक संवाद का अंतरविरोध बढ़ गया है। रिश्तों की गहराई तकनीक से नहीं, बल्कि समय और भरोसे के निवेश से आती है। इस डिजिटल जाल से बाहर निकलने के लिए हमें कुछ कठोर कदम उठाने होंगे। घर में गैजेट फ्री जोन होना चाहिए जैसे घर में डाइनिंग टेबल और बेडरूम को फोन मुक्त क्षेत्र बनाएं। टेक्स्ट के बजाय कॉल करें, और कॉल के बजाय मिलने को प्राथमिकता दें।
यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन दुनिया हमारी असल जिंदगी का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं। तकनीक कनेक्शन देती है, पर अपनापन इंसान ही देता है। तकनीक एक दोधारी तलवार है। यह हमें जोडऩे की शक्ति तो रखती है, लेकिन रिश्तों को वह आत्मा नहीं दे सकती है जो केवल वास्तविक स्पर्श और समय से आती है। वर्चुअल दुनिया ने संवाद को आसान जरूर बनाया है, लेकिन रिश्तों को गहरा बनाने की जिम्मेदारी आज भी हमारी ही है। याद रखिए, जब आप स्क्रीन बंद करते हैं, तो आपके पास वही लोग बचते हैं जिन्होंने आपके साथ असल जिंदगी का समय साझा किया है। तकनीक हमें नेटवर्क दे सकती है, लेकिन परिवार और दोस्ती तो केवल इंसानी अहसासों से ही पनपती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्क्रीन पर बिताया गया समय एक डेटा है, लेकिन अपनों के साथ बिताया गया समय एक याद है। यह छोटा स्क्रीन एक खूबसूरत नशा है जिसका रोज-रोज इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह तकनीक दुनिया के सामने एक बड़ी उपलब्धि की तरह आई थी। लेकिन यह दुनिया के सामने एक समस्या की तरह है। दुनिया का लगभग हर छोटा बड़ा देश इस समस्या का सामना कर रहा है। हर कोई छुटकारा चाहता है लेकिन उसके लिए बहुत बड़ा मनोबल और इच्छा शक्ति चाहिए । हम चि_ियों की दुनिया में खुश थे लेकिन तकनीक की इस बड़ी सुविधा की दुनिया में दुखी हैं।

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