भानुप्रतापपुर। जिले के ग्राम पंचायत पर्रेकोडो में गोदावरी माइंस के प्रस्तावित वेस्ट डंपिंग यार्ड को लेकर बवाल शुरू हो गया है। डंपिंग यार्ड के लिए प्रस्तावित 60.84 हेक्टेयर भूमि पर की गई वृक्ष गणना को लेकर ग्रामीणों और स्थानीय जानकारों ने राजस्व व वन विभाग की संयुक्त टीम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि प्रशासन ने माइनिंग कंपनी को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से पेड़ों की वास्तविक संख्या को छुपाया है।
मौके पर पहुंचे रेंजर, पत्रकारों ने पकड़ी गड़बड़ी
मंगलवार को वन विभाग के दुर्गुकोंदल रेंजर सतीश मिश्रा, डिप्टी रेंजर श्रीकांत यदु और फॉरेस्ट गार्ड रोहित नाग की मौजूदगी में स्थानीय पत्रकारों ने मौके का मुआयना किया। जांच के दौरान पाया गया कि 23 से 30 सेंटीमीटर गोलाई वाले दर्जनों पेड़ों पर नंबरिंग ही नहीं की गई है। साथ ही सेफ्टी जोन के पीछे की तरफ के पेड़ों को गणना से पूरी तरह बाहर रखा गया है। जानकारों का दावा है कि यदि निष्पक्ष रूप से दोबारा गणना की जाए, तो वृक्षों की संख्या में 1500 से 2000 तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
खसरा नंबरों के घालमेल से वन घनत्व छुपाने की कोशिश?
विवाद का एक मुख्य केंद्र खसरा क्रमांक 188/1, 247/1 एवं 100 हैं। राजस्व रिकॉर्ड में ये तीनों अलग-अलग इकाइयां हैं, लेकिन संयुक्त टीम ने इनकी गणना एक साथ कर रिपोर्ट तैयार कर दी है। पृथक विवरण न देकर प्रशासन ने वास्तविक ‘वन घनत्व’ को कम दिखाने का प्रयास किया है।। यदि प्रति खसरा पेड़ों की सघनता दिखाई जाती, तो नियमानुसार इसे ‘वन’ घोषित करना पड़ता, जिससे डंपिंग की अनुमति मिलना मुश्किल हो जाता।
सुप्रीम कोर्ट के ‘गोदावरमन फैसले’ का उल्लंघन
क्षेत्र में 11,984 वृक्षों की मौजूदगी खुद चीख-चीख कर कह रही है कि यह क्षेत्र पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने टी.एन. गोदावरमन बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भूमि को केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर नहीं, बल्कि उसके भौतिक स्वरूप और वृक्षावरण के आधार पर ‘वन’ माना जाना चाहिए। प्रशासनिक रिपोर्ट में इस वैज्ञानिक और कानूनी दृष्टिकोण का अभाव स्पष्ट नजर आ रहा है।
पर्यावरण और आजीविका पर मंडराता खतरा
भले ही यह भूमि राजस्व रिकॉर्ड में ‘पहाड़ चट्टान’ मद में दर्ज हो, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई और वेस्ट डंपिंग से क्षेत्र में विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। डंपिंग से निचले क्षेत्रों की कृषि भूमि और जल स्रोत जहरीले हो जाएंगे। पेड़ों के कटने से मृदा अपरदन बढ़ेगा, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन का खतरा पैदा होगा। स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका सीधे तौर पर इन वनों से जुड़ी है, जिस पर यह प्रोजेक्ट सीधा प्रहार है।
ग्रामीणों की मांग: लागू हो वन संरक्षण अधिनियम
क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए अब यह मांग उठने लगी है कि इस पूरी भूमि पर तत्काल वन संरक्षण अधिनियम, 1980 लागू किया जाए और किसी भी प्रकार की गैर-वानिकी गतिविधि पर रोक लगाई जाए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि दोबारा सही तरीके से वृक्ष गणना नहीं की गई और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ बंद नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।