दुर्गुकोंदल: लकड़ी तस्करी का ‘सिंडिकेट’ उजागर, ऑडियो-वीडियो वायरल होने के बाद भी कंप्यूटर ऑपरेटर को बचाने में जुटे अफसर!

भानुप्रतापपुर/दुर्गुकोंदल।
पूर्व वन मंडल भानुप्रतापपुर के अंतर्गत आने वाले दुर्गुकोंदल परिक्षेत्र में भ्रष्टाचार और अवैध लकड़ी तस्करी का एक बड़ा मामला तूल पकड़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर ऑडियो और वीडियो वायरल हुए चार दिन बीत जाने के बाद भी विभाग के रेंजर और डीएफओ द्वारा आरोपी कंप्यूटर ऑपरेटर पर कोई ठोस कार्यवाही न करना, वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

क्या है पूरा मामला?

मिली जानकारी के अनुसार, दुर्गुकोंदल परिक्षेत्र कार्यालय में पदस्थ कंप्यूटर ऑपरेटर अजय कृदंत राव, जो खुद को रेंजर से भी प्रभावशाली बताता है, का एक वीडियो और ऑडियो सामने आया है। इसमें वह दल्ली बालोद के एक ठेकेदार के साथ भानुप्रतापपुर के ‘तरसा होटल’ में बैठकर अवैध सौदेबाजी करता दिख रहा है।

सौदे की इनसाइड स्टोरी:

मालिक मलगुजा (इमारती लकड़ी) की कटाई और परिवहन के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करने के एवज में 25,000 रुपये प्रति गाड़ी का सौदा तय किया गया। इस सिंडिकेट में डिप्टी रेंजर और बीट गार्ड तक की मिलीभगत की बात सामने आ रही है।

फर्जीवाड़े का ‘मॉडल’: खेत के नाम पर जंगल की कटाई

दुर्गुकोंदल क्षेत्र में अवैध तस्करी का यह खेल सालों से चल रहा है। सूत्रों की मानें तो सबसे पहले किसानों के खेतों से लकड़ी कटाई के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं।
इन्हीं दस्तावेजों की आड़ में जंगलों से कीमती इमारती लकड़ी काटकर तस्करी की जाती है।
यदि गलती से कोई वाहन पकड़ा भी जाता है, तो रसूख और मिलीभगत के चलते उसे रातों-रात छोड़ दिया जाता है।

अधिकारियों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

हैरानी की बात यह है कि सबूत सार्वजनिक होने के बावजूद उच्चाधिकारी मौन साधे हुए हैं। क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि रेंजर और डीएफओ स्तर के अधिकारी आरोपी कंप्यूटर ऑपरेटर को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। इस रवैये से स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है।

क्या विभाग के बड़े अधिकारियों की शह पर यह सिंडिकेट चल रहा है❓

चार दिन बाद भी आरोपी ऑपरेटर को निलंबित क्यों नहीं किया गया❓

क्या इस मामले की कोई निष्पक्ष जांच होगी या इसे फाइलों में दबा दिया जाएगा❓

दुर्गुकोंदल क्षेत्र में अवैध चिरान और लकड़ी परिवहन की खबरें लगातार सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन अब सीधी संलिप्तता के प्रमाण मिलने के बाद भी कार्यवाही न होना प्रशासन की मंशा पर पानी फेर रहा है। अब देखना यह है कि शासन इस संगठित अपराध पर लगाम कसता है या ‘रक्षक ही भक्षक’ वाली कहावत चरितार्थ होती रहेगी।

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