-त्वरित टिप्पणी- सुभाष मिश्र
राजनीति में उम्मीदें बार-बार टूटती हैं, लेकिन कुछ टूटनें सिर्फ राजनीतिक नहीं होतीं, वे भावनात्मक भी होती हैं। आम आदमी पार्टी के साथ यही हुआ। यह सिर्फ एक पार्टी नहीं थी, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ खड़े हुए उस गुस्से का राजनीतिक रूपांतरण थी, जो भ्रष्टाचार, सत्ता अहंकार और पारंपरिक दलों की अवसरवादी राजनीति से उपजा था। झाड़ू सिर्फ चुनाव चिह्न नहीं था, वह प्रतीक था सफाई का, प्रतिरोध का और बदलाव का।
आपने कहा था राजनीति बदली जाएगी, सत्ता की संस्कृति बदली जाएगी। लोकपाल आएगा, शुचिता आएगी, ईमानदारी राजनीति का नया मानक बनेगी। यही वह भाषा थी, जिसने आम आदमी को पहली बार लगा कि राजनीति सिर्फ नेताओं की जागीर नहीं, उसकी भी हिस्सेदारी हो सकती है।
लेकिन आज वहीं लोग पूछ रहे हैं आप ऐसे तो न थे। जो आरोप आप दूसरों पर लगाते थे, वही आरोप आप पर लगे। जिन राजनीतिक चालों की आलोचना करते थे, उन्हीं के बीच आप घिरते चले गए। शराब घोटाले से लेकर सत्ता केंद्रीकरण तक, ‘शीश महल’ से लेकर तानाशाही नेतृत्व की छवि तक एक-एक कर वह नैरेटिव बनता गया, जिसने आपके नैतिक दावे को कमजोर किया। अदालतों से राहत मिलना एक बात है, लेकिन जनता की अदालत में बनी धारणा दूसरी। और राजनीति में धारणा ही अक्सर निर्णायक होती है।
असल संकट सिर्फ आरोपों का नहीं, आत्मा के क्षरण का है। आंदोलन से निकली पार्टी धीरे-धीरे उसी राजनीतिक ढांचे में ढलती दिखी, जिसे बदलने का दावा था। सवाल यह नहीं कि दूसरे दलों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं या नहीं। सवाल यह है कि जो खुद को विकल्प कहता था, वह भी अगर वैसा ही दिखने लगे, तो जनता जाए कहाँ?
आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी नैतिक विश्वसनीयता थी। वही उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी। जब वही संदेह के घेरे में आई, तब दरारें दिखनी शुरू हुईं। साथी छूटे, सहयोगी असहज हुए, और अब राज्यसभा सांसदों में असंतोष की खबरें उसी संकट का विस्तार लगती हैं। यदि अपने ही लोग साथ छोड़ रहे हैं, तो हर बार बाहरी साजिश का तर्क पर्याप्त नहीं होता। कहीं न कहीं भीतर भी कुछ टूटा है।
यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में विरोधी दलों को तोडऩे की संस्कृति नई नहीं है। भाजपा पर यह आरोप लगता रहा है कि वह चुनावी जीत के लिए राजनीतिक इंजीनियरिंग में दक्ष है। महाराष्ट्र से लेकर दूसरे राज्यों तक उदाहरण सामने हैं। पंजाब में भी अगर ऐसी कोशिशें हो रही हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह आधा सच है। पूरा सच यह भी है कि कोई घर बाहर से तभी टूटता है, जब भीतर दरारें पहले से हों। और शायद आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी वैचारिक कमजोरी भी यहीं रही। उसने नैतिकता की बात की, पर स्पष्ट वैचारिक आधार नहीं गढ़ पाई। कभी भगत सिंह, कभी अंबेडकर, कभी गांधी प्रतीक बहुत थे, पर दिशा धुंधली रही। वह क्या है, यह कम स्पष्ट था, वह क्या नहीं है, यह ज्यादा कहा गया। राजनीति केवल नैतिक दावों से नहीं, वैचारिक स्थिरता से भी चलती है। दिल्ली की हार ने संकेत दिया था कि जनता सिर्फ काम नहीं, चरित्र भी देखती है। और अब पंजाब के पहले अगर पार्टी भीतर से कमजोर होती दिखे, तो चिंता स्वाभाविक है। आम आदमी पार्टी के सामने आज असली चुनौती भाजपा नहीं, कांग्रेस नहीं, विपक्ष नहीं अपनी मूल आत्मा को बचाने की है। वह आत्मा, जिसने उसे जन्म दिया था।
क्योंकि सवाल विरोधी नहीं पूछ रहे, सवाल वही लोग पूछ रहे हैं जिन्होंने कभी भरोसा किया था। आप ऐसे तो न थे। अगर इस सवाल का जवाब आत्ममंथन से नहीं मिला, तो यह सिर्फ एक पार्टी का संकट नहीं, भारतीय राजनीति में एक बड़े वैकल्पिक प्रयोग की विफलता भी मानी जाएगी।