कमतर सुरक्षा के जरिए विकास की कीमत चुकता छत्तीसगढ़

-सुभाष मिश्र


छत्तीसगढ़ आज देश के औद्योगिक नक्शे पर तेजी से उभरता हुआ राज्य है। चूना पत्थर, लौह अयस्क, डोलोमाइट और बॉक्साइट जैसी अपार खनिज संपदा ने इसे सीमेंट, इस्पात और ताप विद्युत उद्योगों का केंद्र बना दिया है। ‘पावर स्टेट’ बनने की दौड़ में यहां निवेश, उत्पादन और बुनियादी ढांचे का विस्तार हो रहा है। लेकिन इस चमकदार विकास कथा के पीछे एक कड़वा सच लगातार उभर रहा है, क्या यह विकास सुरक्षित भी है?
पिछले तीन वर्षों में औद्योगिक दुर्घटनाओं में सैकड़ों श्रमिकों की मौत का आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि उस मॉडल की पोल खोलता है जिसमें उत्पादन लक्ष्य, समय-सीमा और लागत नियंत्रण के सामने मानव जीवन की कीमत घटती जा रही है। जब हर चौथे दिन एक श्रमिक अपनी जान गंवाता हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम विकास कर रहे हैं या जोखिम का संस्थानीकरण?
हाल ही में वेदांत के ताप विद्युत संयंत्र में हुआ भीषण हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं था, यह उस पूरी औद्योगिक मानसिकता का आईना है जिसमें ‘सुरक्षा’ एक औपचारिकता बनकर रह गई है। वर्षों से बंद पड़ी या दिवालिया प्रक्रिया से पुनर्जीवित परियोजनाएं जब दोबारा चालू की जाती हैं, तो क्या उनका तकनीकी पुनर्मूल्यांकन उतनी ही गंभीरता से होता है जितना उनका आर्थिक पुनरुद्धार? जंग खाई मशीनरी, कमजोर बॉयलर प्रेशर पार्ट्स, थके हुए कन्वेयर बेल्ट, और निष्क्रिय सुरक्षा तंत्र, ये केवल इंजीनियरिंग खामियां नहीं, बल्कि संभावित आपदाओं के संकेत हैं।
और अगर फर्नेस ट्रिप, कोल मिल ट्रिप, प्रोटेक्शन लॉजिक फेल जैसी बातें सामने आती हैं, तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि ‘सुरक्षा संस्कृति’ की विफलता है। एक ऐसी संस्कृति, जहां नियम किताबों में हैं, लेकिन व्यवहार में अनुपस्थित।
छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना भी इस संकट को और गहरा करती है। यहां बड़ी संख्या में ग्रामीण और कम जागरूक श्रमिक आसानी से उपलब्ध हैं। उनकी मजबूरी और सीमित विकल्पों का फायदा उठाकर उद्योगों द्वारा सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना आसान हो जाता है। सवाल यह नहीं कि उद्योग क्यों आ रहे हैं, सवाल यह है कि क्या वे जिम्मेदारी के साथ आ रहे हैं?
इस पूरे घटनाक्रम में जवाबदेही का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उद्योग समूहों से जुड़े कई प्रमुख लोगों जैसे नवीन जिंदल, किरण बेदी, मोहनदास पाई ने निष्पक्ष जांच की मांग की है। यह मांग उचित है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हर दुर्घटना के बाद केवल जांच ही पर्याप्त है? या फिर हमें उस ढांचे को बदलने की जरूरत है जो ऐसी दुर्घटनाओं को जन्म देता है?
समाधान स्पष्ट हैं, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी है। थर्ड-पार्टी मटेरियल हेल्थ ऑडिट, सुरक्षा इंटरलॉक सत्यापन, संरचनात्मक अखंडता परीक्षण, स्वतंत्र संचालन सुरक्षा ऑडिट और व्यापक आपातकालीन जोखिम आकलन, ये केवल तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि जीवन बचाने के उपाय हैं। राष्ट्रीय स्तर पर औद्योगिक सुरक्षा मानकों की समीक्षा अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुकी है।
छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे संसाधन-समृद्ध राज्यों में विकास की रफ्तार तेज है। लेकिन यदि यह विकास मानव जीवन की कीमत पर हो रहा है, तो यह प्रगति नहीं, एक त्रासदी है। ‘विकास’ का अर्थ केवल उत्पादन और मुनाफा नहीं होना चाहिए, यह सुरक्षित कार्यस्थल, सम्मानजनक श्रम और जिम्मेदार औद्योगिक आचरण का पर्याय भी होना चाहिए।
आज जरूरत है एक नए विकास मॉडल की जहां हर परियोजना की सफलता का पैमाना केवल मेगावाट या टन उत्पादन न हो, बल्कि यह भी हो कि वहां एक भी श्रमिक की जान जोखिम में न हो। क्योंकि अंतत: सवाल यही है, क्या हम बिजली बना रहे हैं, या चिताएं जला रहे हैं?

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