दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की मुख्य साजिशकर्ता बताई जा रही कांग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहां की जमानत के खिलाफ दिल्ली पुलिस की घेराबंदी को पूरी तरह विफल कर दिया है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुदेजा की डिवीजन बेंच ने पुलिस की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें स्पेशल कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को चुनौती दी गई थी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इशरत जहां को जमानत मिले चार साल से अधिक का समय बीत चुका है और इस लंबी अवधि के दौरान उन्होंने जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब निचली अदालत का फैसला सुरक्षित हो गया है और पुलिस को इस मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है।
आतंकी कृत्य और साजिश की दलीलें कोर्ट में फेल
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए निचली अदालत के आदेश को कानून के विपरीत और त्रुटिपूर्ण करार दिया था। पुलिस का आरोप था कि दंगों के दौरान हुआ चक्का-जाम महज विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि एक आतंकवादी कृत्य की श्रेणी में आता है जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर खतरा पैदा हुआ था। पुलिस ने डिवीजन बेंच के सामने दलील दी कि इशरत जहां दंगों की मुख्य साजिशकर्ता रही हैं और उनके खिलाफ यूएपीए जैसी गंभीर धाराओं के तहत सबूत मौजूद हैं जिन्हें निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया। हालांकि हाई कोर्ट ने पुलिस के इन तर्कों को अपर्याप्त माना और कहा कि इतने वर्षों बाद जमानत रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं दिखता।
चार साल की शांतिपूर्ण जमानत बनी ढाल
इशरत जहां को साल 2020 में दंगों की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था जिसके बाद राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें पर्याप्त सबूतों के अभाव और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत दी थी। पुलिस का दावा था कि हिंसा एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी जिसमें कई लोगों की जान गई और जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया था। पुलिस ने अपनी अपील में दंगे की गंभीरता और जनहानि का हवाला देते हुए जमानत रद्द करने की मांग की थी लेकिन अदालत ने आरोपी के चार साल के आचरण को प्राथमिकता दी। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर लंबे समय से बाहर चल रहे व्यक्ति की स्वतंत्रता को तब तक नहीं छीना जा सकता जब तक कि वह शर्तों का उल्लंघन न करे।