बिहार में अनुकंपा पर नौकरी के नियमों में बड़ा बदलाव: पटना हाईकोर्ट का कड़ा फैसला, अब हर किसी को नहीं मिलेगी सरकारी कुर्सी

बिहार में अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का सपना देखने वालों के लिए पटना हाईकोर्ट से एक बड़ा और कड़ा फैसला सामने आया है जिसने भविष्य की नियुक्तियों के समीकरण बदल दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई जन्मसिद्ध अधिकार या विरासत नहीं है बल्कि यह केवल उन परिवारों के लिए एक आपातकालीन सहारा है जिनके पास आजीविका का कोई भी साधन नहीं बचा हो। जस्टिस पार्थ सारथी की एकलपीठ ने एक याचिका को खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी है कि यदि मृतक कर्मचारी के परिवार में पहले से ही कोई सदस्य सरकारी सेवा में कार्यरत है और उसकी आय से परिवार का गुजारा संभव है तो ऐसी स्थिति में दूसरे सदस्य का दावा पूरी तरह अमान्य होगा। कोर्ट के इस कड़े रुख ने उन लोगों के लिए रास्ते बंद कर दिए हैं जो परिवार में अन्य सरकारी सेवक होने के बावजूद अनुकंपा के नाम पर पद हथियाने की कोशिश में थे।

बड़े भाई की सरकारी नौकरी बनी बाधा और कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दिया झटका

बेगूसराय के सिट्टू कुमार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जिला अनुकंपा समिति के उस निर्णय को सही ठहराया जिसमें उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया था। सिट्टू के पिता बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस में हवलदार थे जिनकी मृत्यु के बाद उन्होंने इस आधार पर नौकरी मांगी थी कि उनका बड़ा भाई अलग रहता है और परिवार की आर्थिक मदद नहीं करता है। हालांकि अदालत ने इस तर्क को सिरे से नकारते हुए कहा कि चूंकि बड़ा भाई जेल पुलिस में वार्डन के पद पर तैनात है और उसे नियमित वेतन मिल रहा है इसलिए परिवार को आर्थिक रूप से असहाय नहीं माना जा सकता। सरकार की दलीलों और तथ्यों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि अलग रहने का बहाना बनाकर सरकारी नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती और न ही इसे नियुक्ति का आधार बनाया जा सकता है।

अनुकंपा नियुक्ति के लिए तय हुई नई लक्ष्मण रेखा और पात्रता की शर्तें

पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अनुकंपा के तहत नौकरी पाने के लिए अनिवार्य शर्तों को भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ताकि भविष्य में किसी प्रकार का भ्रम न रहे। अब केवल पति, पत्नी, पुत्र या अविवाहित पुत्री ही इस श्रेणी में आवेदन के पात्र होंगे बशर्ते मृतक कर्मचारी की मौत के पांच साल के भीतर आवेदन किया गया हो और परिवार के पास आय का कोई भी स्थायी स्रोत मौजूद न हो। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि इस नीति का प्राथमिक उद्देश्य परिवार को अचानक आए वित्तीय संकट से उबारना है न कि किसी को पिछली तारीख से रोजगार का अवसर प्रदान करना। इस फैसले के बाद अब प्रशासन और चयन समितियों के पास उन आवेदनों को खारिज करने का कानूनी आधार मिल गया है जहां परिवार का कोई न कोई सदस्य पहले से ही सरकारी सिस्टम का हिस्सा है।

Related News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *