रियाद/नई दिल्ली। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश सऊदी अरब पर हुए हमलों ने ग्लोबल मार्केट में हलचल मचा दी है। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, इन हमलों की वजह से देश के तेल उत्पादन में रोजाना 6 लाख बैरल की कमी आई है। इसके साथ ही, मुख्य पाइपलाइन से होने वाली सप्लाई में भी 7 लाख बैरल की कटौती करनी पड़ी है।
क्या है मामला? (बैकग्राउंड) सऊदी अरब की 1,200 किलोमीटर लंबी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ तेल सप्लाई का सबसे अहम रास्ता है। यह पाइपलाइन कच्चे तेल को सीधे लाल सागर के बंदरगाह तक पहुँचाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि तेल ले जाने वाले जहाजों को विवादित ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से होकर नहीं गुजरना पड़ता। भारत के लिए भी यह मार्ग बहुत जरूरी है, क्योंकि हम अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से मंगवाते हैं।
बाजार पर असर: बढ़ी कीमतें पर फिलहाल लगाम सप्लाई कम होने की खबर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। ब्रेंट क्रूड करीब 0.78% बढ़कर 96.65 डॉलर और अमेरिकी तेल (WTI) लगभग 1% बढ़कर 98.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया है। हालांकि, कीमतों में यह उछाल बहुत ज्यादा नहीं है। इसकी वजह यह है कि निवेशक अभी अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता (सीजफायर) के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं।
सप्लाई पर खतरा और कूटनीति तनाव के बीच अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के प्रमुख ने कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि समुद्र के रास्तों को किसी देश की राजनीति का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए। फिलहाल तेल से लदे करीब 230 जहाज रवाना होने का इंतजार कर रहे हैं। व्यापारिक नियम कहते हैं कि किसी भी देश को यह तय करने का हक नहीं है कि कौन सा जहाज वहां से गुजरेगा और कौन सा नहीं।
भारत की स्थिति भारतीय तेल कंपनियों के लिए यह स्थिति नाजुक है। राहत की बात यह है कि पिछले दिनों वैश्विक स्तर पर दाम गिरने से ‘इंडियन क्रूड बास्केट’ की कीमत 115.52 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही है। लेकिन अगर सऊदी अरब से सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रही, तो भारत में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल सबकी नजरें पाकिस्तान में हो रही शांति वार्ता पर टिकी हैं, जिससे बाजार की अगली दिशा तय होगी।