-सुभाष मिश्र
नई दिल्ली में हाल ही में हुई मुलाकात में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने एक बदले हुए बस्तर की तस्वीर रखी। इस बातचीत का केंद्र केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक स्पष्ट दावा और उससे जुड़ी विकास की कार्ययोजना थी। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को अवगत कराया कि बस्तर अब नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है और राज्य सरकार ‘बस्तर रोडमैप 2.0 के तहत क्षेत्र के समग्र विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। उन्होंने ‘नियद नेल्ला नार—यानी ‘आपका अच्छा/आदर्श गांव जैसी योजनाओं के सकारात्मक परिणामों का उल्लेख करते हुए बताया कि अब इन पहलों का विस्तार बस्तर से बाहर अन्य जिलों में भी किया जाएगा। साथ ही, कृषि, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी और आजीविका को केंद्र में रखकर एक व्यापक विजऩ प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुत किया गया, जिससे यह संकेत गया कि राज्य सरकार शांति के बाद विकास को अगले बड़े एजेंडे के रूप में स्थापित करना चाहती है।
यही वह बिंदु है, जहां से बस्तर की नई कहानी शुरू होती दिखाई देती है। लंबे समय तक नक्सल हिंसा, भय और असुरक्षा से जूझता रहा यह इलाका अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अगर वास्तव में हालात सामान्य हो रहे हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक सफलता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की संभावनाओं का भी संकेत है। स्वाभाविक रूप से, जब बंदूकें खामोश होती हैं, तब सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और रोजगार के रास्ते खुलते हैं।
लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर के समानांतर राजनीति भी उतनी ही सक्रिय है। गृहमंत्री अमित शाह द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर लगाए गए आरोपों को लेकर सियासी बयानबाजी तेज है। यह दर्शाता है कि बस्तर केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बना हुआ है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि राजनीतिक बहस के बीच मूल मुद्दा—बस्तर के आम लोगों का जीवन कहीं पीछे न छूट जाए।
अगर बस्तर में शांति स्थायी रूप से स्थापित होती है, तो यह क्षेत्र निवेश, पर्यटन और उद्योग के लिए नए अवसर खोल सकता है। खनिज संपदा, वन संसाधन और अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य, ये सभी तत्व बस्तर को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की क्षमता रखते हैं। अब तक जो इलाका डर और असुरक्षा के कारण मुख्यधारा से दूर रहा, वहां निवेशकों और पर्यटकों की संभावित आमद एक नई आर्थिक कहानी लिख सकती है। केंद्र सरकार का बढ़ता फोकस और प्रधानमंत्री स्तर पर दिलचस्पी इस प्रक्रिया को गति दे सकती है।
फिर भी, असली परीक्षा अब शुरू होती है। छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल राज्य है, जहां 33प्रतिशत से अधिक आबादी जिनकी संख्या 92 लाख के लगभग है जनजातीय समुदायों की है। छत्तीसगढ़ का वन क्षेत्रफल यहां के कुल क्षेत्रफल का 44.21 है जो कि देश में सर्वाधिक क्षेत्र वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ शामिल हैसवाल यह है कि क्या विकास का लाभ वास्तव में इन समुदायों तक पहुंचेगा? क्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे परिवार आत्मनिर्भर बन पाएंगे, या वे सस्ते अनाज और सरकारी योजनाओं पर ही निर्भर रहेंगे? क्या मनरेगा जैसी योजनाएं प्रभावी रूप से लागू होंगी और क्या ‘नियद नेल्ला नार जैसी पहलें लोगों के जीवन में ठोस बदलाव ला पाएंगी?
इन सवालों के जवाब केवल योजनाओं में नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन में छिपे हैं। बस्तर में विकास की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासनिक तंत्र कितना संवेदनशील और जवाबदेह बनता है। क्या अधिकारी जनजातीय समाज की भाषा, संस्कृति और जरूरतों को समझते हुए काम करेंगे? क्या विकास की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होगी? और क्या संवैधानिक प्रावधानों जैसे छठी अनुसूची पर गंभीरता से विचार किया जाएगा?
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई यह मुलाकात निश्चित रूप से एक सकारात्मक संदेश देती है कि बस्तर अब देश के विकास नक्शे पर एक नई पहचान बनाने की ओर बढ़ सकता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बस्तर जैसे क्षेत्रों में बदलाव केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि निरंतर, संवेदनशील और सहभागी प्रयासों से ही संभव होता है।
आज बस्तर उम्मीद और यथार्थ के बीच खड़ा है। अगर शांति के इस दौर को सही दिशा में आगे बढ़ाया गया, तो यह क्षेत्र आने वाले समय में देश के लिए एक सफल परिवर्तन मॉडल बन सकता है।