भानुप्रतापपुर। पूर्व वन मंडल भानुप्रतापपुर के दुर्गुकोंदल परिक्षेत्र में भ्रष्टाचार और लकड़ी तस्करी का एक ऐसा सिंडिकेट सामने आया है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर कालिख पोत दी है। सोशल मीडिया पर ऑडियो और वीडियो वायरल हुए चार दिन बीत जाने के बाद भी आरोपी कंप्यूटर ऑपरेटर पर कोई कार्रवाई नहीं होना, विभाग की मंशा पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
होटल में हुआ सौदा: 25 हजार प्रति गाड़ी की डिमांड
मामला दुर्गुकोंदल परिक्षेत्र में पदस्थ दैनिक वेतनभोगी (Daily Wager) कंप्यूटर ऑपरेटर अजय कृदंत राव से जुड़ा है। आरोप है कि राव ने बालोद (दल्ली) के एक ठेकेदार से ‘मालिक मलगुजा’ इमारती लकड़ी के अवैध परिवहन के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करने का सौदा किया। भानुप्रतापपुर के एक निजी होटल में हुई इस डील का ऑडियो और वीडियो अब सार्वजनिक हो चुका है, जिसमें डिप्टी रेंजर और बीट गार्ड के नाम पर प्रति गाड़ी 25 हजार रुपये की मांग की जा रही है।
अफसरों की मेहरबानी: आरोपी को ‘कवच’ दे रहे रेंजर और DFO?
हैरानी की बात यह है कि सबूत सार्वजनिक होने के बावजूद विभागीय अधिकारी कुंभकर्णी नींद में हैं। वन मण्डलाधिकारी (DFO) द्वारा जांच टीम गठित करने की बात तो कही जा रही है, लेकिन धरातल पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। चर्चा है कि रेंजर और वरिष्ठ अधिकारी अपने चहेते ऑपरेटर को बचाने के लिए मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश कर रहे हैं।
“क्या रेंजर से भी ऊपर है कंप्यूटर ऑपरेटर?”
स्थानीय लोगों और कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी आखिर इतना बेखौफ कैसे है? विभागीय सूत्रों की मानें तो अजय कृदंत राव खुद को रेंजर से भी ऊंचा अधिकारी समझता है और पूरे कार्यालय को अपने इशारों पर चलाता है।
नियमों की धज्जियां: डेली वेजर को सरकारी आवास, रेगुलर कर्मचारी भटक रहे
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विभाग ने नियम विरुद्ध जाकर इस कंप्यूटर ऑपरेटर को शासकीय आवास आवंटित कर रखा है। जबकि नियमतः दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को आवास का प्रावधान नहीं है। दूसरी ओर, विभाग के कई नियमित कर्मचारी भारी किराया देकर निजी मकानों में रहने को मजबूर हैं।
फर्जीवाड़े का खेल: किसानों के नाम पर जंगल की सफाई
दुर्गुकोंदल क्षेत्र में सालों से यह खेल चल रहा है। कथित तौर पर किसानों के खेत की लकड़ी (मालिक मलगुजा) के नाम पर फर्जी कागजात तैयार किए जाते हैं और उनकी आड़ में जंगलों से अवैध कटाई कर लकड़ी खपाई जाती है। यदि कभी गलती से कोई गाड़ी पकड़ी भी जाती है, तो उसे रसूख और मिलीभगत के दम पर रातों-रात छोड़ दिया जाता है।
क्या उच्चाधिकारी इस सिंडिकेट को तोड़ेंगे या फिर ‘जांच’ के नाम पर केवल समय बर्बाद कर दोषियों को क्लीन चिट देने का रास्ता साफ किया जाएगा? क्षेत्र की जनता अब निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई की मांग कर रही है।