-सुभाष मिश्र
गाड़ासरई में आपको एक ही अस्पताल मिलेगा जो डॉक्टर विजय चौरसिया का है, जहां बैगा आदिवासी इलाज के लिए आते हैं। पड़ोस में उनके बेटे का मेडिकल स्टोर है, उनकी एक नातिन और नाती मेडिकल कॉलेज भोपाल और छिंदवाड़ा में पढ़ते हैं। डॉक्टर साहब गाड़ासरई के अपने जीवन से बहुत खुश हैं। मैंने सपरिवार उनसे जाकर उनके क्लीनिक में भेंट की। उन्हें आज की जनधारा की ओर से प्रकाशित साहित्य वार्षिकी और हमारी विरासत और बिरसा किताब भेंट की। उन्होंने भी अपनी दो किताबें बैगा जनजाति की लोक कथाएं और प्रकृति पुत्र बैगा हमें भी भेंट की। जो लोग भी गाड़ासरई या बैगा जनजीवन के बारे में कुछ जानना चाहते हैं तो उन्हें डॉक्टर विजय चौरसिया के रूप में एक इनसाइक्लोपीडिया हमेशा उपलब्ध मिलेगा, जो अपने आतिथ्य सत्कार में भी लाजवाब है।

(एक यात्रा संस्मरण)
डॉ. विजय चौरसिया से मुलाकात किसी सामान्य व्यक्ति से मिलने जैसा अनुभव नहीं था, बल्कि यह एक ऐसे जीवित दस्तावेज़ से संवाद था, जिसने अपना पूरा जीवन जंगल, जनजाति और संस्कृति के बीच बिताया है। गाड़ासरई की उस शांत दोपहर में, जब चारों ओर जंगलों की हरियाली और पहाड़ों की निस्तब्धता पसरी थी, तब उनकी बातों में सिर्फ शब्द नहीं थे—बल्कि आधी सदी का अनुभव, संघर्ष और संवेदना थी।
रायपुर से शुरू हुई यह यात्रा जैसे-जैसे मध्यप्रदेश के मैकल पर्वतीय अंचल की ओर बढ़ती है, सड़कें संकरी होती जाती हैं और प्रकृति घनी। मंडला, डिंडौरी, बालाघाट, कवर्धा और शहडोल के बीच फैला बैगाचक सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक अलग दुनिया है जहां आज भी समय धीमी चाल से चलता है।

जंगल के बीच एक अलग संसार
यह वही भारत है, जहां एक ओर अंतरिक्ष में रॉकेट भेजे जा रहे हैं, और दूसरी ओर ऐसे समुदाय भी है जिन्होंने आज तक रेलगाड़ी को नजदीक से नहीं देखा। बैगा जनजाति का जीवन इसी विरोधाभास का सबसे जीवंत उदाहरण है।
मैकल पर्वत की घाटियों और नर्मदा नदी के किनारे बसे ये लोग प्रकृति के इतने करीब हैं कि उनका हर व्यवहार, हर परंपरा, हर विश्वास उसी से उपजा है।
डॉ. चौरसिया की पुस्तक प्रकृति पुत्र बैगा केवल एक किताब नहीं, बल्कि इस जनजाति के जीवन दर्शन का दर्पण है। वे बताते हैं कि उन्होंने बैगा परिवारों के बीच रहकर, उन्ही की तरह जीवन जीकर उनके अनुभवों को आत्मसात किया—यही वजह है कि उनका लेखन किसी बाहरी शोधकर्ता जैसा नहीं, बल्कि भीतर से उपजा हुआ प्रतीत होता है।
लोकजीवन: परंपरा और स्वतंत्रता का अनूठा संगम
बैगा समाज में विवाह केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत चयन का उत्सव है। यहाँ युवतियों को जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता है जो तथाकथित सभ्य समाज के लिए आज भी बहस का विषय है।
हाट-बाजारों और सामूहिक नृत्यों में रिश्ते बनते हैं, परखे जाते हैं और फिर सामाजिक स्वीकृति पाते हैं। दहेज जैसी कुप्रथा से यह समाज आज भी लगभग अछूता है—यह अपने आप में एक बड़ा सामाजिक संदेश है।
लोककथाओं में इतिहास, गीतों में पहचान
बैगा जनजाति के पास लोककथाओं, मिथकों और किंवदंतियों का विशाल भंडार है। गोंड समुदाय के साथ उनके गहरे संबंध हैं—इतने कि वे खुद को उनका ही एक अंश मानते हैं।
डॉ. चौरसिया ने गोंड़ और परधान जनजातियों की गाथाओं जैसे बाना गीत और रामायनी—को भी लिपिबद्ध किया है। ये सिर्फ गीत नहीं, बल्कि एक ऐसा इतिहास हैं जो किताबों में नहीं, बल्कि स्मृति और स्वर में जीवित है।
विकास और हकीकत का द्वंद्व
शहडोल से बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान की ओर जाते हुए जंगलों के बीच यह अहसास गहरा होता है कि हम सिर्फ एक यात्रा नहीं कर रहे, बल्कि एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ विकास की परिभाषा अलग है। यहाँ प्रकृति सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जल, जंगल और जमीन सिर्फ नारे नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। और इसी बीच एक सच्चाई और भी सामने आती है—बैगा जनजाति अकेली नहीं है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में कमर जनजाति, अबूझमाडिय़ा जनजाति, पहाड़ी कोरवा जनजाति और बिरहोर जनजाति जैसी कई जनजातियां भी हैं, जो धीरे-धीरे समय की धुंध में खोती जा रही हैं।
सरकार ने इनके लिए योजनाएँ बनाई हैं, विकास अभिकरण गठित किए हैं, कागज़ों पर उनके जीवन को बेहतर बनाने की कई रूपरेखाएँ तैयार हैं। लेकिन जब आप इन जंगलों के भीतर जाकर उनकी आँखों में झांकते हैं, तो एक अलग ही कहानी सामने आती है—
अधूरी सड़कों, सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं, संघर्ष करती आजीविका और बदलती दुनिया के बीच अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद। कहीं-कहीं बदलाव की हल्की रोशनी जरूर दिखती है, लेकिन वह अभी भी घने जंगल के अंधेरे को पूरी तरह चीर नहीं पाई है।
जनसंख्या और अस्तित्व की चुनौती
इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि बैगा जनजाति की जनसंख्या में उतार-चढ़ाव रहा है, लेकिन आज भी यह समुदाय सीमित संख्या में ही बचा है।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में इनकी उपस्थिति प्रमुख है, लेकिन आधुनिकता, विस्थापन और संसाधनों के दोहन के बीच इनका अस्तित्व लगातार चुनौती में है।
डॉ. चौरसिया: एक व्यक्ति, एक सेतु
डॉ. विजय चौरसिया जैसे लोग इस पूरी कहानी के महत्वपूर्ण पात्र हैं। उन्होंने न सिर्फ बैगा जनजाति को समझा, बल्कि उसे समाज के सामने रखा।
उनका काम हमें यह याद दिलाता है कि विकास की दौड़ में अगर हम अपनी जड़ों—अपनी विरासत को भूल गए, तो शायद हम बहुत कुछ खो देंगे।
अंतत: यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक यात्रा भी थी। यह समझने की यात्रा कि हमारा विरसा, हमारी विरासत केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। यह देखने की यात्रा कि जिन लोगों को हम पिछड़ाकहते हैं, वे कई मायनों में हमसे कहीं अधिक संतुलित और प्रकृति के करीब हैं।
बैगाचक के जंगलों से लौटते समय यही महसूस होता है कि असली समृद्धि शायद वही है, जो प्रकृति के साथ तालमेल में हो, न कि उसके दोहन में।