भिलाई। छत्तीसगढ़ के जंगलों और जनजातीय अंचलों में पीढ़ियों से संजोकर रखे गए पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को अब आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसा जाएगा। आईआईटी (IIT) भिलाई ने राज्य के पारंपरिक वैद्यों के औषधीय ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने और उसे डिजिटल रूप में सुरक्षित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी शोध परियोजना की शुरुआत की है। इस काम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी अत्याधुनिक तकनीक की मदद ली जा रही है।
385 वैद्यों का सर्वे पूरा, 40 सीधे शोध से जुड़े
संस्थान में आयोजित ‘ट्रेडिशनल हेल्थकेयर’ (पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा) विषय पर एक विशेष मंथन सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि इस परियोजना के तहत प्रदेश के 385 पारंपरिक वैद्यों का व्यापक सर्वेक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इनमें से 35 से 40 वैद्यों को सीधे इस वैज्ञानिक शोध से जोड़कर उनके अनुभवों, इलाज के तौर-तरीकों और औषधीय नुस्खों का दस्तावेजीकरण शुरू कर दिया गया है।
आईआईटी भिलाई का कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग इस पूरे जनजातीय ज्ञान को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने और एआई के जरिए जड़ी-बूटियों के सटीक विश्लेषण पर तेजी से काम कर रहा है।
गंभीर बीमारियों के इलाज में मिलेगी मदद
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि आदिवासियों और वैद्यों के पास मौजूद कई दुर्लभ औषधीय जानकारियां भविष्य में चिकित्सा जगत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती हैं। इस शोध के जरिए मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है:
जटिल रोग: कैंसर, मधुमेह (डायबिटीज), न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका संबंधी) विकार और गंभीर फ्रैक्चर के इलाज में जनजातीय चिकित्सा के प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन करना।
वनस्पति संरक्षण: जंगलों में पाए जाने वाले दुर्लभ औषधीय पौधों को लुप्त होने से बचाना।
रोजगार के अवसर: औषधीय पौधों के संरक्षण और संवर्धन के जरिए स्थानीय आदिवासियों व ग्रामीणों की आजीविका को मजबूत करना।
परंपरा और विज्ञान का अनूठा समन्वय
“पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान हमारे राज्य की एक अमूल्य धरोहर है। समय की मांग है कि हम इसका संरक्षण करने के साथ-साथ इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भी करें।”
— विकास मरकाम, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधीय पौधा बोर्ड
“पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का यह समन्वय स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में नए और क्रांतिकारी आयाम स्थापित करेगा।”
— प्रो. राजीव प्रकाश, निदेशक, आईआईटी भिलाई
अभियान में सबका साथ
इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में केवल तकनीकी विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि राज्य के विभिन्न जिलों के पारंपरिक वैद्य, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि इस बहुमूल्य जनजातीय ज्ञान को भविष्य की वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उपयोगी बनाया जा सके।