शेर देखने का रोमांच: जंगल, किस्से और एक बदलता रिश्ता

-सुभाष मिश्र

यात्रा संस्मरण

शेर को देखना, यह सिर्फ एक दृश्य नहीं, एक एहसास है और यह एहसास हर बार कुछ नया सिखा जाता है। सर्कस में शेर देखा जा सकता है, चिडिय़ाघर में भी, लेकिन जंगल में जब वह अपने पूरे रौब के साथ सामने आता है, तब समझ में आता है कि उसे जंगल का राजा क्यों कहा जाता है। एक बात यहां शुरू में ही साफ कर देना जरूरी है, जिसे हम अक्सर बोलचाल में नजरअंदाज कर देते हैं। हम जंगल में जिस ‘शेर’ को देखने जाते हैं, असल में वह बाघ होता है। हिंदी में टाइगर को बाघ कहा जाता है, जबकि शेर असल में लायन को कहा जाता है।
भारत में शेर अगर कहीं है, तो वह सिर्फ Gir National Park और उसके आसपास के इलाके में ही मिलता है। बाकी देश के जिन टाइगर रिजर्व में हम सफारी करने जाते हैं, कान्हा टाइगर रिजर्व, ताडोबा का टाइगर रिजर्व हो या फिर बांधवगढ़ का टाइगर रिजर्व हो या वह जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व वहां हम बाघ देखने जाते हैं।


प्रसंगवश केदारनाथ सिंह की कविता
नये दिन के साथ
एक पन्ना खुल गया कोरा
हमारे प्यार का
सुबह,
इस पर कहीं अपना नाम तो लिख दो!
बहुत से मनहूस पन्नों में
इसे भी कहीँ रख दूंगा
और जब-जब हवा आकर
उड़ा जायेगी अचानक बन्द पन्नों को
कहीं भीतर
मोरपंखी का तरह रक्खे हुए उस नाम को
हर बार पढ़ लूंगा।
अभी हाल ही में मैंने सपरिवार बांधवगढ़ में इत्मीनान से बाघ देखा। लौटकर वहां की यात्रा पर एक संस्मरण लिखा। मेरे पारिवारिक संदीप पौराणिक जो वन्य जीवन में गहरी रूचि रखते हैं और हर साल उनपर बेहतरीन कैलेंडर प्रकाशित करते हैं उन्होंने मुझे बाघ देखने को लेकर अपने संस्मरण को लिखने कहा सो यह लिखा गया।
लेकिन हमारी बोलचाल में ‘शेर शब्द इतना गहराई से बैठ गया है कि हम बाघ को भी शेर ही कह देते हैं। शायद इसलिए भी कि हमारे लिए वह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि ताकत, रौब और जंगल के राजा का प्रतीक है।


जंगल में जाने वाला लगभग हर इंसान एक ही उम्मीद लेकर जाता है ‘आज शेर दिख जाएÓ और सच कहें, जब तक शेर नहीं दिखता, जंगल अधूरा-सा लगता है। मंडला में रहने के दौरान कान्हा टाइगर रिजर्व आना-जाना लगा रहता था। कई बार शेर देखने का मौका मिला। एक बार तो अभ्यारण के बाहर, मुक्की गेट की ओर जाते समय, बीच नाले में शेर बैठा दिख गया। ऐसा दृश्य जिसे देखकर गाडिय़ां रुक जाती थीं, और लोग बस उसे देखते रह जाते थे।
धीरे-धीरे जंगल सफारी का तरीका भी बदल गया है।
पहले हाथी पर बैठकर शेर दिखाए जाते थे, अब यह प्रथा लगभग खत्म हो गई है। अब सूचना, ट्रैकिंग और तकनीक का सहारा है, कहीं-कहीं कैमरे लगाए गए हैं, ट्रेंकुलाइजऱ से मॉनिटरिंग होती है, ताकि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
एक बार ताडोबा टाइगर रिजर्व में ऐसा संयोग बना कि एक साथ छह बाघ, मां और उसके बच्चे देखने को मिले। वह दृश्य आज भी आंखों में ताजा है। उसी दौरान वहां अभिनेत्री रवीना टंडन भी सफारी पर थीं, और वह भी उसी उत्सुकता से उन बाघों को देख रही थीं। उस पल लगा कि जंगल सबको एक जैसा कर देता है, चाहे आम आदमी हो या फिल्म स्टार।


हाल ही में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में जो अनुभव हुआ, वह शायद सबसे अलग था। सुबह की सफारी में कुछ लोगों को शेरों का झुंड देखने मिला, लेकिन जब हम पहुंचे तो हमें एक शेर मिला, जो पूरी शांति और इत्मीनान से अपना समय बिता रहा था। वह धीरे-धीरे आया, पानी में बैठ गया, और काफी देर तक वहीं रहा। हम सब लोग बस उसे देखते रहे, बिना किसी हड़बड़ी के, बिना किसी शोर के। फिर वह उठा, चला और अचानक एक जंगली कुत्ते पर नजर पड़ी। उसने दौड़ लगाई शिकार की सहज प्रवृत्ति लेकिन फिर वह रुक गया। करीब आधे घंटे का यह पूरा दृश्य था, जिसका कुछ हिस्सा हमने कैमरे में भी कैद किया। वह सिर्फ एक दृश्य नहीं, एक ‘मेमोरीÓ बन गया।
जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में तो एक बार नदी के बीच इतना विशाल बाघ देखा, जैसा पहले कभी नहीं देखा था। हर जंगल, हर मुलाकात—एक नई कहानी दे जाती है। लेकिन जंगल की कहानी सिर्फ शेर तक सीमित नहीं है।
बांधवगढ़ के पास बैगा समाज के बीच एक अलग ही रिश्ता देखने को मिलता है। वे शेर को अपना ‘छोटा भाई’ मानते हैं। घर के बाहर पानी रखते थे, इस विश्वास के साथ कि रात में शेर आएगा, पानी पीएगा और चला जाएगा। वे जंगल से डरते नहीं, जंगल उनके लिए जीवन है। जहां हम शेर देखने जाते हैं, वे शेर के साथ जीते हैं।


यही फर्क है, एक तरफ वह समाज है जो जंगल को अपना मानता है, और दूसरी तरफ हम हैं, जो उसे देखने जाते हैं। आज जहां टाइगर हैं, वहां एक पूरी ‘टाइगर इकोनॉमीÓ खड़ी हो गई है। होटल, रिसॉर्ट, गाइड, गाडिय़ां—सब कुछ उसी पर निर्भर। लेकिन इसके साथ एक सच्चाई और भी है, शिकार आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खाल, हड्डियां, और दिखावे की लालसा यह सब अभी भी कहीं न कहीं मौजूद है। कहा जाता है कि शेर बेवजह हमला नहीं करता। वह उतना ही शिकार करता है, जितनी उसे जरूरत होती है। अगर पेट भरा हो, तो वह उठता भी नहीं। शायद यही बात हमें सोचने पर मजबूर करती है। जंगल का जानवर अपनी जरूरत से ज्यादा नहीं लेता, लेकिन इंसान कई बार जरूरत से ज्यादा के पीछे भागता है। आदिवासी जीवन में पेड़, पौधे, जानवर—सब ईश्वर हैं। उनके लिए जंगल पूजा है, जीवन है। और शायद हमें भी यही सीखने की जरूरत है कि जंगल सिर्फ रोमांच के लिए नहीं, समझ के लिए भी है। शेर दिखना रोमांच है, लेकिन जंगल को समझना वही असली अनुभव है।

टाइगर फैक्ट फाइल:
भारत में ३००० से ज्यादा बाघ
दुनिया के ७०फीसदी से अधिक टाइगर भारत में
एक बाघ का इलाका: २०-१०० वर्ग किमी
एक बार शिकार के बाद कई दिन तक आराम

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